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Brajmohan Ram: दोस्तों ने जुटाए थे चुनाव के पैसे, जानिए ओडिशा के राज्यपाल ब्रजमोहन राम की कुछ अनकही दास्तान

दोस्तों के चंदे से चुनाव लड़ने वाले लातेहार के लाल ने तय किया शून्य से शिखर तक का ऐतिहासिक सफर, आज भी जड़ों से जुड़े हैं कदम।

by Kanchan Kumar
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​रांची: राजनीति की दुनिया में अक्सर चमक-धमक और भारी-भरकम संसाधनों की चर्चा होती है, लेकिन झारखंड के लातेहार जिले के चंदवा से ताल्लुक रखने वाले ब्रजमोहन राम की कहानी कुछ अलग ही बयां करती है। यह कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। पास में न पैसे थे और न संसाधन, बस अपनों का अटूट भरोसा और कुछ कर दिखाने का जज्बा था। कभी उनके मित्रों ने आपस में पैसे जोड़कर और जीप में डीजल डलवाकर उन्हें चुनाव मैदान में उतारा था, आज वही ब्रजमोहन राम ओडिशा के राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर विराजमान हैं।
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यारी की वह अनूठी मिसाल

​बात उस दौर की है जब ब्रजमोहन राम ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने का मन बनाया था। तब उनके पास चुनाव प्रचार के लिए बड़ी गाड़ियां या आधुनिक साधन नहीं थे। ऐसे में उनके यार-दोस्त ढाल बनकर खड़े हो गए। किसी ने कागजों पर भाषण तैयार किया, तो किसी ने अपनी जेब से पैसे निकालकर प्रचार वाली जीप के लिए डीजल का इंतजाम किया। कोई खुद स्टीयरिंग थामकर गाड़ी चलाता था, तो कोई गांव-गांव जाकर मतदाताओं से संपर्क साधता था। राजेश चंद्र पाण्डेय, नरेश प्रसाद गुप्ता और नवल किशोर लाल जैसे मित्रों का वह समूह केवल एक उम्मीदवार का प्रचार नहीं कर रहा था, बल्कि अपने एक दोस्त के सपने को सच करने में जुटा था। वह दोस्ती और भरोसे की ऐसी मिसाल थी, जिसने आगे चलकर उन्हें बिहार विधानसभा और फिर लगातार तीन बार लोकसभा तक पहुंचाया।

​सियासत की ऊंचाइयों के बाद भी माटी से मोह

​सत्ता के गलियारों में चाहे कितना भी मुकाम हासिल हो जाए, लेकिन इंसान की असली पहचान उसकी जड़ों से होती है। ब्रजमोहन राम इस बात की जिंदा मिसाल हैं। राजभवन तक पहुंचने के बाद भी उनका दिल आज भी अपनी जन्मभूमि चंदवा में ही बसता है। वे आज भी अपने पुराने सामाजिक दायित्वों को पूरी शिद्दत से निभा रहे हैं। चाहे बात लगभग 55 साल पुरानी ‘विवेकानंद किशोर संस्थान’ के जरिए छठ व्रतियों की सेवा करने की हो या फिर चंदवा में शवदाह गृह के निर्माण में सक्रिय योगदान देने की, वे हर सुख-दुख में अपने लोगों के साथ खड़े नजर आते हैं।

​आज ओडिशा का राजभवन उनका नया कार्यक्षेत्र जरूर बन गया है, लेकिन उनकी इस पूरी यात्रा की असली खूबसूरती उन छोटे-छोटे हाथों और उन यारों की मेहनत में छिपी है, जिन्होंने कभी एक पुरानी जीप पर बैठकर उनके सपनों को उड़ान दी थी। चंदवा की माटी से जुड़ा यह सफर आज हर उस इंसान के लिए प्रेरणा है, जो यह मानता है कि सच्ची निष्ठा और अपनों के प्यार से हर मुकाम हासिल किया जा सकता है।
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