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महाराष्ट्र में गुइलेन-बैरे सिंड्रोम के कारण पहली मौत, क्या है यह बीमारी

जीबीएस दूषित पानी या भोजन के सेवन के कारण होने वाले बैक्टेरियल इंफेक्शन से होता है। दस्त, पेट में दर्द और शरीर में अचानक कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते है।

by Reeta Rai Sagar
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सेंट्रल डेस्क। सोमवार को महाराष्ट्र के सोलापुर में Gullian Berries syndrome (जीबीएस) वायरस से पहली मौत हुई। पुणे के धायरी के एक 40 वर्षीय व्यक्ति ने सोलापुर के एक निजी अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। शुरुआत में मृतक का पुणे में इलाज किया गया था, लेकिन उसे विशेष देखभाल के लिए दूसरे अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया था।

जीबीएस सिंड्रोम के 16 मरीज गंभीर रूप से बीमार

अब तक जीबीएस सिंड्रोम के 101 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 81 मरीज पुणे एमसी, 14 पिंपरी चिंचवाड़ एमसी और 6 अन्य जिलों से हैं। पुणे प्रकोप का केंद्र बन चुका है। हर दिन जीबीएस के 28 नए मामले दर्ज किए जा रहे हैं। प्रभावितों में से 16 मरीज गंभीर रूप से बीमार हैं और उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया है।

खतरनाक लेकिन, महामारी फैलने की आशंका नहीं

इस बढ़ते सिंड्रोम को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार की ओर से एक त्वरित प्रतिक्रिया दल का गठन किया गया था। गुइलेन-बर्रे सिंड्रोम (जीबीएस) एक दुर्लभ ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर है, जो मरीज को पैरालिसिस की स्थिति में पहुंचा देता है। राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग की ओर से कहा गया है कि एक राज्य स्तरीय रैपिड रिस्पांस टीम ने प्रभावित क्षेत्र का दौरा किया था। गुइलेन-बर्रे सिंड्रोम खतरनाक है, लेकिन इससे महामारी फैलने की आशंका नहीं है।

केंद्र ने भेजी टीम
राज्य विभाग ने कहा कि ग्रामीण जिला अधिकारियों और पुणे नगर निगम को निगरानी गतिविधियों को बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। जीबीएस के प्रकोप के बाद की स्थिति का आकलन करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा एक टीम को पुणे भी भेजा गया है। अधिकारियों ने पुणे के विभिन्न हिस्सों से पानी के नमूने एकत्र किए हैं और एहतियात के तौर पर उन्हें जैविक और रासायनिक विश्लेषण के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशाला में भेजा गया है।

प्रभावित क्षेत्रों में 25,578 से अधिक घरों का किया गया सर्वेक्षण
राज्य सरकार ने निजी चिकित्सकों से कहा है कि वे जीबीएस के प्रत्येक रोगी का इलाज करने के बारे में अधिकारियों को सूचित करें। वे हेल्थ प्रोमोशन एक्टिविटी को बढ़ाने के बारे में भी सोच रहे हैं। स्वास्थ्य अधिकारियों ने अब तक प्रभावित क्षेत्रों में 25,578 से अधिक घरों का सर्वेक्षण किया है। महाराष्ट्र राज्य स्वास्थ्य विभाग की रैपिड रिस्पांस टीम (आरआरटी) पुणे नगर निगम और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों के सहयोग से सर्वेक्षण कर रही है।

बीमारी रोकने के लिए सभी उपाय किए जा रहे हैं: स्वास्थ्य मंत्री

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री प्रकाशराव आबिटकर ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि वह पुणे जा रहे हैं और जीबीएस से घबराने की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा कि मामलों में वृद्धि को रोकने के लिए सभी उपाय किए जा रहे हैं। बढ़ती चिंता को दूर करने के लिए, सरकार ने महात्मा फुले जन आरोग्य योजना (एमपीजेएवाई) के तहत उपचार की लागत में संशोधन किया है। इससे पहले, इस योजना के तहत निजी अस्पतालों को प्रति मरीज 80,000 रुपये आवंटित किए गए थे।

स्वास्थ्य मंत्री ने दोहराई सरकार की प्रतिबद्धता

उन्होंने बताया कि इस राशि को अब बेहतर इलाज और उन्नत पहुंच के लिए दोगुनी कर दी गई है। इस फैसले की घोषणा करते हुए एमपीजेएवाई के सीईओ अन्नासाहेब चव्हाण ने बीमारी से जूझ रहे परिवारों को राहत प्रदान करने के महत्व पर जोर दिया। स्वास्थ्य मंत्री आबिटकर ने संकट को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता जताई।

गुइलेन-बर्रे सिंड्रोम क्या है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, गुइलेन-बैरे सिंड्रोम एक दुर्लभ न्यूरोलॉजिकल सिंड्रोम है, जिसमें पेरिफेरल नर्वस सिस्टम पर इम्यून सिस्टम द्वारा अटैक किया जाता है। सिंड्रोम उन नसों को प्रभावित करता है जो मांसपेशियों की गति को नियंत्रित करते हैं और जिनके पास स्पर्श, तापमान और दर्द जैसे सेंसेशन होते हैं जो पैरों और बाहों में सनसनी पहुंचाते है। इसके बाद मांसपेशियों में कमजोरी और सांस लेने या निगलने में कठिनाई होने लगती हैं।

फ्रांसीसी न्यूरोलॉजिस्ट जॉर्जेस गुइलेन और जीन एलेक्जेंडर बर्रे ने पहली बार 1916 में इस सिंड्रोम की खोज की थी। हालांकि बीमारी के पीछे का सटीक कारण स्पष्ट नहीं है। यह अक्सर वायरल या बैक्टेरियल इंफेक्शन, टीकाकरण या बड़ी सर्जरी के बाद होता है। इस दौरान इम्यून सिस्टम अति सक्रिय हो जाती है। जीबीएस दूषित पानी या भोजन के सेवन के कारण होने वाले बैक्टेरियल इंफेक्शन से होता है। दस्त, पेट में दर्द और शरीर में अचानक कमजोरी जैसे लक्षण दिखाई देते है।

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