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Jharkhand Government: ​विकास कार्यों की सुस्त रफ्तार पर वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर सख्त, बोले- दिसंबर तक 75 हजार करोड़ खर्च करने का लक्ष्य कैसे होगा पूरा

by Kanchan Kumar
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रांची: ​झारखंड में विकास की गति पर सुस्ती का ग्रहण लगता नजर आ रहा है। राज्य का योजना बजट अपनी पूरी क्षमता से धरातल पर उतरने के लिए तरस रहा है। इसके पीछे की वजह है प्रशासनिक तंत्र की कछुआ चाल। स्थिति यह है कि वित्तीय वर्ष के कई महीने बीत जाने के बाद भी सरकारी विभागों के खातों में धन सुरक्षित रखा है, लेकिन उसे खर्च करने की फुर्सत किसी अधिकारी को नहीं मिल पा रही है। खुद वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने इस लचर कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने इस बाबत सीधे विकास आयुक्त को एक सख्त पत्र भेजा है।

सरकारी तिजोरी की स्थिति- आंकड़ों की जुबानी

​आंकड़ों पर गौर करें तो तस्वीर बेहद चौंकाने वाली सामने आती है। चालू वित्तीय वर्ष के तहत पुनरीक्षित योजना बजट में कुल 1,06,200.94 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि तय की गई थी। इसके एवज में 22 अक्टूबर तक महज 31,196.72 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए हैं, जो कुल बजट का मात्र 29.38 फीसदी है।

​नियमों और पूर्व के दिशा-निर्देशों (10 जून 2015 के वित्त विभाग के पत्र) के मुताबिक, हर साल 30 सितंबर तक ही योजना मद की कम से कम आधी यानी 50% राशि खर्च हो जानी चाहिए थी। मगर, अक्टूबर का महीना बीतने को है और खर्च महज़ 30% के आसपास ही झूल रहा है। अब सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दिसंबर तक 75,000 करोड़ रुपये खर्च करने के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य को कैसे पूरा किया जाए। इस जादुई आंकड़े तक पहुंचने के लिए आने वाले कुछ हफ्तों में विभागों को लगभग 43,800 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि पानी की तरह बहाानी होगी, जो वर्तमान सुस्ती को देखते हुए किसी पहाड़ चढ़ने जैसा नजर आता है।

​कौन-से विभाग फिसड्डी? पेयजल से लेकर स्वास्थ्य तक का बुरा हाल

​यदि विभागों के स्तर पर झांक कर देखें, तो कई बड़े और महत्वपूर्ण महकमे इस रेस में बुरी तरह पिछड़ चुके हैं।

​पेयजल एवं स्वच्छता विभाग

यह महकमा फिसड्डी साबित हुआ है। 5,200 करोड़ से ज्यादा के बजट में से इस विभाग ने सिर्फ 4.88 प्रतिशत यानी 253 करोड़ के आसपास ही खर्च किया है।

​गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग

जनता की सुरक्षा और व्यवस्था से जुड़ा यह विभाग भी सिर्फ 6.20% खर्च के साथ काफी पीछे है।
​ग्रामीण विकास विभाग : ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाले इस महकमे का खर्च महज 11.59 प्रतिशत ही दर्ज किया गया है।

​स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग का खर्च 24.81% और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा का खर्च 26.17% पर अटका हुआ है। इसके अलावा पथ निर्माण, कृषि, और शहरी विकास विभागों की गति भी बेहद निराशाजनक रही है।

​डेढ़ साल का टेंडर ड्रामा और प्रशासनिक लेटलतीफी

​आखिर इस बदहाली की जड़ें कहां हैं? वित्त मंत्री ने अपने पत्र में इस दर्द का भी खुलकर जिक्र किया है। निर्माण कार्यों से जुड़े विभागों में सिर्फ कागजी कार्रवाई और टेंडर प्रक्रिया पूरी करने में ही 6 महीने से लेकर डेढ़-डेढ़ साल तक का वक्त बर्बाद कर दिया जाता है। जब टेंडर ही महीनों बाद फाइनल होगा, तो जमीन पर काम समय से कैसे शुरू हो पाएगा?

​इस दीमकनुमा देरी से पार पाने के लिए अब वित्त मंत्री ने साफ निर्देश दिए हैं कि सभी निर्माण विभाग अपनी निविदा प्रक्रिया को हर हाल में 60 दिनों के भीतर समेट लें।

​वित्तीय अनुशासन बनाम विकास की राह

​मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली सरकार हमेशा से पारदर्शी वित्तीय प्रबंधन और कड़े अनुशासन की बात कहती आई है। लेकिन जब योजनाएं समय पर धरातल पर नहीं उतरतीं, तो जनता के कल्याण का सपना कागजों तक ही सिमट कर रह जाता है। अब देखना यह होगा कि वित्त मंत्री की इस फटकार और विकास आयुक्त के हस्तक्षेप के बाद क्या सुस्त पड़े अधिकारी अपनी रफ्तार तेज कर पाते हैं या फिर विकास की फाइलें एक बार फिर बाबूओं की मेजों पर ही धूल फांकती नजर आएंगी।

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