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Jharkhand Bureaucracy : नौकरशाही : कुमार का संतुलन

Jharkhand Bureaucracy : संतुलन का सिद्धांत सब जगह लागू होता है। नौकरशाही वाले मुहल्ले में तो सारा खेल संतुलन पर ही टिका है। संतुलन बिगड़ा तो बना-बनाया काम खराब। बना रहा तो सबकी बल्ले-बल्ले। इन दिनों गांव-गिरांव के विकास वाले गलियारे में कार्यपालिका और विधायिका के बीच बना संतुलन खासी चर्चा में है। मजे की बात यह कि सबके बावजूद विकास का पहिया रफ्तार नहीं पकड़ रहा है। कहीं न कहीं कोई बड़ा पेंच फंस रहा है। आखिर क्या चल रहा है अंदरखाने, जानें द फोटोन न्यूज के एक्जीक्यूटिव एडिटर की कलम से।

by Dr. Brajesh Mishra
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Jharkhand Bureaucracy : गुरु दैनिक दिनचर्या से निपट कर आराम फरमा रहे थे। इतने में मोबाइल पर किसी का फोन आ गया। प्रणाम-बंदगी के बाद गुरु ने अपनी तरफ से पूछा- मामा संग साहब का संतुलन कायम हुआ? दूसरी तरफ की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। गुरु अपनी तरफ से ही बकइती किए पड़े थे। चलो, अच्छा है, पहले वाले यही नहीं समझ पाए। दरअसल, नौकरशाही के गलियारे में सारा खेल बैलेंस का है। जिसने जितना साध लिया, वह उतनी देर तक मैदान में टिका रहता है।

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करीब 20 मिनट की चर्चा के बाद फोन कटा। गुरु को अहसास हुआ‌ कि आसपास कोई और बैठा है। नजर पड़ते ही पूछ लिया- अरे तुम कब आए? मन ही मन कुछ नया हाथ लगने की हसरत लिए जवाब दिया- आप किसी को संतुलन का मर्म समझा रहे थे। उत्तर सुनकर गुरु समझ गए कि बात का बतंगड़ हो गया है। बोले- चलो यह सब छोड़ो। कुछ अपनी सुनाओ। मुद्दे को दूसरी ओर मोड़ने की जुगत थी। मामा वाली कहानी मझधार में फंसती नजर आई। सो, बिना देर किए सीधे पूछ लिया- यह मामा वाली क्या बला है? गुरु समझ गए, पत्ते खोले बिना यह शख्स मानने वाला नहीं। विवश होकर बोलना शुरू किया।

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कहा- वनांचल के गांव-गिरांव वाले महकमे में कुछ समय से संतुलन साधने का बड़ा खेला चल रहा है। जब कभी व्यवस्था विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाती है, कोई न कोई व्यवधान आकर खड़ा हो जाता है। कभी सत्ता समीकरण बिगड़ने लगता है, तो कभी साहब की सहमति का मामला फंस जाता है। बताने वाले बताते हैं कि माननीय के मामाद्वय कहानी के मुख्य किरदार हैं। पूर्व में संतुलन नहीं साधने वाले निवासन को श्रीहीन होना पड़ा। विरोध में ऐसा जोरदार अभियान चला कि उन्हें निर्वासन तक झेलना पड़ा।

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व्यवस्था बदलाव के तहत महकमे की कमान कुमार साहब के हाथ में दी गई। कहा जाता है कि पूर्व के अनुभवों से सीख लेते हुए कुमार साहब आगे बढ़े। पहली फुरसत में मामा संग संतुलन कायम कर लिया। थोड़ा ऊपर-नीचे कर निचले स्तर पर परिवर्तन की फाइल तक तैयार कर ली गई। अब पूरा मामला अनुमोदन पर अटक रहा है। जैसे-जैसे समय की सुई आगे बढ़ रही है, दबाव बढ़ रहा है। मामाद्वय का धैर्य जवाब दे रहा है। हालांकि साहब के संतुलन पर सबको भरोसा है। कुमार सिस्टम के मंजे खिलाड़ी हैं।

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कम बोलकर काम निकाल लेने की उनमें अद्भुत कला है। मामला बस मौजूदा माहौल के कारण फंस रहा है। गुरु की बात पूरी हो चुकी थी। कहानी के सारे किरदार सामने आ चुके थे। दिमाग में बस एक सवाल घूम रहा था, जब सब संतुलित हो चुका है तो मामा की राह का असली रोड़ा कौन है? गुरु को प्रणाम कर मन ही मन जवाब की तलाश करते हुए अपनी राह पकड़ ली।

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