
विभागीय जांच में मौखिक गवाह पेश नहीं किए जाने पर हाईकोर्ट ने निरस्त किया था आदेश
रांची : मनरेगा के तहत वृक्षारोपण योजनाओं की निगरानी में लापरवाही के आरोप में दंडित झारखंड प्रशासनिक सेवा के अधिकारी संजय पीएम कुजूर को राहत मिली है। झारखंड हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने उनकी एक वेतनवृद्धि रोकने के दंड को रद्द कर दिया है। कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग ने इस संबंध में संकल्प जारी किया है।
संजय पीएम कुजूर गुमला जिले के घाघरा प्रखंड में तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) के पद पर कार्यरत थे। उन पर मनरेगा के तहत स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा कराए जा रहे वृक्षारोपण कार्यों का नियमित निरीक्षण, पर्यवेक्षण और अनुश्रवण नहीं करने का आरोप लगा था। इसके अलावा योजनाओं के क्रियान्वयन में लापरवाही, मनरेगा के दिशा-निर्देशों का सही ढंग से अनुपालन नहीं कराने और स्वयंसेवी संस्थाओं को कथित वित्तीय अनियमितताओं में सहयोग पहुंचाने के आरोप भी लगाए गए थे।
2022 में दिया गया था दंड
विभागीय जांच में आरोपों को आंशिक रूप से सही पाए जाने के बाद 25 अगस्त 2022 को उनकी एक वेतनवृद्धि असंचयी प्रभाव से रोकने का दंड दिया गया था। इसके खिलाफ संजय कुजूर ने झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। यह मामला डब्ल्यूपी (एस) संख्या 5269/2022 के रूप में दर्ज था।
मौखिक गवाह पेश नहीं करने पर कोर्ट ने रद्द किया दंड
याचिका पर सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने 18 अगस्त 2026 को पारित आदेश में विभागीय जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए दंडादेश निरस्त कर दिया। अदालत ने पाया कि आरोपों और संबंधित दस्तावेजों को साबित करने के लिए विभाग की ओर से किसी मौखिक गवाह की जांच नहीं कराई गई थी। इसके बाद अदालत ने राज्य सरकार को 12 सप्ताह के भीतर अधिकारी को सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया।
कार्मिक ने जारी किया संकल्प
हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में राज्य सरकार ने वेतनवृद्धि रोकने के दंड को रद्द कर दिया है। कार्मिक विभाग के संकल्प के अनुसार यह कार्रवाई अदालत के 18 अगस्त 2026 के न्यायादेश के आलोक में की गई है। अब अधिकारी को अदालत के निर्देश के अनुरूप परिणामी लाभ देने की प्रक्रिया पूरी की जानी है।

