Jharkhand Bureaucracy : गुरु गरमाए हुए थे। घर के नए सेवादार ने ब्लैक कॉफी शुगर के साथ उबाल दी थी। यह बेहद नागवार गुजरा। दरअसल, गुरु सेहत को लेकर बेहद सजग जीव हैं। खाने-पीने में नमक-तेल का ऊंच-नीच बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते। फिर भला बेस्वाद पेय कैसे गटक लें? घर में घुसते ही पता चला कि सुबह से पूरे परिवार को झाड़ पर झाड़ लगाए जा रहे हैं।
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कमरे में प्रवेश करते देखा तो थोड़े नरम पड़े। बोले- आओ यार बैठो। अब तो घर में चाय के लिए बोलना तक मुश्किल हो गया है। पता नहीं, कब कौन क्या परोस कर चला जाए? गुरु के पहले वाक्य से नाराजगी की प्रारंभिक सूचना पुष्ट हो गई थी। गुरु को सहज करना जरूरी था। सो, अपनी तरफ से कहा- छोड़िए चाय-पानी। कोई अच्छी किताब दीजिए। बहुत दिनों बाद एक साथ दो दिनों की छुट्टी मिली है। कुछ पठन-पाठन किया जाए। गुरु हंसते हुए बोले- अच्छा, इस बार किताब उड़ाने आए हो। गुरु के सान्निध्य की पहली शर्त यही थी कि आदमी किताबी हो।
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अपनी भी एंट्री इसी योग्यता पर हुई थी। गुरु ने पास की आलमारी से चार-पांच किताबें निकाल कर सामने रख दी। कहा, जो ठीक लगे ले लो। बस पढ़कर वापस जरूर कर देना। गुरु में यही बात सबसे अच्छी थी। आदमी चाहे जितने बड़े हों, अपनी जरूरत की छोटी से छोटी चीज मांगने में परहेज नहीं करते। खैर, किताबें इधर-उधर पलटने के बाद कहा- दो ले लेते हैं।
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बात पूरी होते ही गुरु खिलखिला कर हंस पड़े। बोले, ले लो, ले लो। आजकल डबल का ट्रेंड चल रहा है। बात सुनकर लगा, इशारा किसी खास तरफ है। पूछा- गुरु कौन सा ट्रेंड? कुछ बताइए। जवाब मिला, अरे वनांचल की नौकरशाही में चल रही इस कहानी से कैसे अनजान हो? मदिरालय से माल खींचने के मुल्जिम पर रहबर के रहम की बड़ी चर्चा है।
सचिवालय से छुट्टी के साथ फिर एक बार फील्ड की कमान सौंप दी गई। वह भी दो-दो प्रभार के साथ। इतनी नरमी के बावजूद साहब हैं कि राहत की सांस नहीं ले रहे। पदभार संभालने के साथ मनो-विनोद का वीडियो वायरल होने लगा। महोदय, मुलाजिम से फरमा रहे कि जो ऑफिसर्स और स्टाफ हैं, उनका काम है या नहीं यहां पर? अधीनस्थ का एक जवाब साहब के सौ सवाल पर भारी पड़ गया। कर्मचारी कहता है कि काम निकालना पड़ता है। दरअसल, साहब के दिल की बात कर्मचारी खूब समझते हैं।
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हाकिम ऐसा माहौल बनाने की कोशिश कर रहे थे कि वह कार्यालय के कामकाज से अनजान हैं। हकीकत यह है कि साहब प्रमंडल से छलांग लगाकर ही सचिवालय शिफ्ट हुए थे। वह भी पूरे भारी-भरकम पदभार के साथ। गुरु जिस नटवर की नागर कथा का अध्याय बांच रहे थे, वह अनंत और अलौकिक है।
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इंजीनियरिंग की सीढ़ी चढ़कर नौकरशाही में कैसे धाक जमानी है, यह कला कोई इनसे सीखे। लिहाजा, व्याख्या को बीच में रोककर कहा- गुरु इस महामानव की बात फिर कभी। अब इजाजत दीजिए। गुरु ने मुस्कुराते हुए विदाई दी। राह चलते अंधेरे में अनिष्ट की आशंका के बीच मन गुनगुनाने लगा….मनोजवं मारुततुल्यवेगं…।
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