
रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC-JSSC परीक्षाएं रद्द करने के मामले में गुरुवार को बड़ा फैसला सुनाया है। इससे राज्य सरकार के निर्णय को तगड़ा झटका लगा है। अदालत ने JPSC 11वीं-13वीं सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर की नियुक्तियों को रद्द करने के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत के इस फैसले के बाद फिलहाल प्रभावित अधिकारी एवं कर्मचारियों की नौकरियां सुरक्षित हो गई हैं।
परीक्षाएं रद्द करने का आदेश नहीं रहेगा प्रभावी
न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने इस मामले में राज्य सरकार और JPSC से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई तक सरकार का परीक्षाएं रद्द करने का आदेश प्रभावी नहीं रहेगा।
प्रभावित अभ्यर्थियों दीपमाला, सोनम कुमारी, सौरव सिंह व अन्य की ओर से अदालत में पक्ष रखा गया। याचिकाकर्ता सोनम कुमारी ने बताया कि उन्होंने दूसरी सरकारी नौकरी छोड़कर 24 नवंबर 2025 को नियुक्ति पत्र लिया था और अपनी ट्रेनिंग भी पूरी कर ली थी। इसके बावजूद 18 अगस्त को अचानक अधिसूचना जारी कर उनकी नियुक्ति रद्द कर दी गई।
क्या था सरकार का फैसला
CID जांच में सामने आए तथ्यों और TDPL कंपनी की भूमिका को देखते हुए राज्य सरकार ने 18 अगस्त की देर रात 2014 से अब तक की कई भर्ती परीक्षाओं की जांच कराने और 22 परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला लिया था। फिलहाल हाईकोर्ट के इस स्टे के बाद अब अंतिम फैसला अदालत की अगली सुनवाई और सरकार-JPSC के जवाब के बाद ही तय होगा।
प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन
अभ्यर्थियों की ओर से पैरवी कर रहे वकील कुमार हर्ष ने कहा कि सरकार ने बिना किसी ठोस आधार और बिना अभ्यर्थियों की गलती साबित किए पूरी प्रक्रिया ही रद्द कर दी, जो सीधे तौर पर प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि किसी भी सरकारी दस्तावेज में यह नहीं लिखा गया है कि अभ्यर्थियों ने क्या गड़बड़ी की थी। बिना किसी कसूर के सबकी नियुक्ति रद्द कर देना सरासर गलत है।
अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने बताया कि हाईकोर्ट ने शुरुआती सुनवाई के दौरान ही सरकार के इस फैसले को अनुचित माना और तुरंत प्रभाव से इस पर रोक लगा दी।
अभ्यर्थियों को देना होगा शप पत्र
अदालत के निर्देशानुसार, जिन अभ्यर्थियों की परीक्षा या नियुक्ति रद्द की गई थी, उन्हें अब एक शपथपत्र जमा करना होगा। इस हलफनामे में अभ्यर्थियों को यह देना होगा कि अगर भविष्य में जांच के दौरान उनमें से किसी की भी कोई भूमिका या गड़बड़ी पाई जाती है, तो वे कोर्ट या सरकार के आने वाले आदेश को मानने के लिए बाध्य होंगे।

