Jamshedpur : देशभर में पर्वत श्रृंखलाओं और नदियों पर बढ़ते संकट को लेकर जमशेदपुर में 22 और 23 मई को दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। यह आयोजन मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल सभागार में होगा, जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से पर्यावरणविद, जल विशेषज्ञ, सामाजिक कार्यकर्ता और नीति विशेषज्ञ भाग लेंगे। संगोष्ठी का आयोजन जलपुरुष राजेंद्र सिंह और विधायक सरयू राय के संरक्षण में किया जा रहा है।
संगोष्ठी के संयोजक दिनेश मिश्र ने सोमवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन में कहा कि झारखंड समेत पूरे देश में पहाड़ों और नदियों का अस्तित्व संकट में है। अनियंत्रित खनन, अतिक्रमण, बड़े निर्माण कार्यों और जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण प्राकृतिक संरचनाएं लगातार प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान में पहाड़ों और नदियों के संरक्षण के लिए कोई स्वतंत्र और ठोस कानून मौजूद नहीं है, जिसके कारण इनके संरक्षण का कार्य कठिन हो गया है।
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 48ए और 51ए(ग) पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी राज्य और नागरिकों दोनों को सौंपते हैं, लेकिन इसके बावजूद पर्वतीय और नदी पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से नष्ट हो रहे हैं। ऐसे में अब समय आ गया है कि भारत सरकार पर्वत संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम तथा नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जनन अधिनियम जैसे सशक्त कानून बनाए।
दिनेश मिश्र ने बताया कि संगोष्ठी में व्यापक विचार-विमर्श के बाद पहाड़ों और नदियों के संरक्षण के लिए अलग-अलग विधेयकों के प्रारूप तैयार किए जाएंगे। इन मसौदों को भारत सरकार को सौंपा जाएगा ताकि संसद में इन्हें अधिनियम का रूप दिया जा सके।
उन्होंने कहा कि प्रस्तावित पर्वत संरक्षण कानून के तहत हिमालय, पश्चिमी घाट, अरावली, विंध्य, सतपुड़ा और नीलगिरि जैसी पर्वत श्रृंखलाओं को पारिस्थितिक दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र घोषित करने, खनन और बड़े निर्माण कार्यों पर नियंत्रण लगाने, जैव विविधता और हिमनदों की रक्षा करने तथा स्थानीय और आदिवासी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने का प्रावधान किया जाना चाहिए। इसके अलावा बड़े बांध, अत्यधिक पर्यटन और वनों की कटाई जैसी गतिविधियों को नियंत्रित करने की भी आवश्यकता बताई गई।
वहीं नदियों के संरक्षण और पुनर्जनन को लेकर उन्होंने कहा कि देश की अधिकांश नदियां अतिक्रमण, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन के कारण नालों में बदलती जा रही हैं। जल संकट, बाढ़ और सूखे की बढ़ती समस्या नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप का परिणाम है। उन्होंने कहा कि नदी पुनर्जनन का अर्थ केवल सफाई नहीं, बल्कि नदी की संपूर्ण पारिस्थितिकी और जलवैज्ञानिक संरचना को पुनर्जीवित करना है।
उन्होंने स्थानीय स्तर पर “नदी पंचायत” और “क्षेत्र सभा” जैसी व्यवस्थाओं को जरूरी बताते हुए कहा कि जल संरक्षण को जन आंदोलन बनाना होगा। साथ ही जल स्रोतों पर अतिक्रमण, खनन और प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।
संवाददाता सम्मेलन में बताया गया कि संगोष्ठी में तैयार होने वाले मसौदे पर्यावरण संरक्षण, जल सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और आने वाली पीढ़ियों के हितों को ध्यान में रखते हुए तैयार किए जाएंगे।

