फीचर डेस्क : चैत्र नवरात्रि 2026 का छठा दिन आज पूरे देश में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। नवरात्रि के नौ दिनों में प्रत्येक दिन देवी दुर्गा के अलग-अलग स्वरूप की पूजा का विधान है, और षष्ठी तिथि मां कात्यायनी को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कात्यायनी शक्ति, साहस और सौंदर्य की अधिष्ठात्री देवी मानी जाती हैं। इस दिन विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करने से साधक को धर्म, विजय और आत्मबल की प्राप्ति होती है।
Navratri Day 6 2026: मां कात्यायनी पूजा का महत्व
चैत्र नवरात्रि के छठे दिन साधक का मन आध्यात्मिक रूप से आज्ञा चक्र में स्थित होता है, जिसे जागृति और उच्च चेतना का केंद्र माना जाता है। यह दिन साधना, आत्मसमर्पण और भक्ति को प्रबल करने वाला माना गया है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लिया, जिससे उनका नाम कात्यायनी पड़ा।
नवरात्रि के छठे दिन की पूजा का शुभ मुहूर्त
छठे दिन पूजा के लिए शुभ समय का विशेष महत्व होता है। प्रातःकालीन शुभ मुहूर्त सुबह 06:21 से 08:30 बजे तक माना गया है। इसके अलावा अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12:03 से 12:52 बजे तक विशेष फलदायी है। शाम के समय सूर्यास्त के आसपास, लगभग 06:30 बजे देवी की आरती करना अत्यंत शुभ माना गया है।
मां कात्यायनी की पूजा विधि
मां कात्यायनी की पूजा विधि में स्वच्छता और नियमों का विशेष ध्यान रखा जाता है। सुबह स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल पर देवी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद गंगाजल से शुद्धिकरण कर दीप प्रज्वलित करें। देवी को पुष्प, अक्षत, रोली और विशेष रूप से शहद का भोग अर्पित करें। पूजा के दौरान मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है।
मां कात्यायनी का प्रिय भोग
इस दिन देवी को शहद का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। शहद शुद्धता और मधुरता का प्रतीक है। इसके साथ ही हलवा-पूरी का भोग भी लगाया जाता है, जो समृद्धि और संतोष का संकेत देता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शहदयुक्त पान का भोग अर्पित करने से भी विशेष कृपा प्राप्त होती है।
मां कात्यायनी की कथा
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से त्रस्त होकर देवताओं ने एक दिव्य शक्ति का सृजन किया, जिसने देवी कात्यायनी के रूप में जन्म लेकर उसका वध किया। महर्षि कात्यायन ने इस शक्ति की प्रथम पूजा की थी, इसलिए यह स्वरूप कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुआ। एक अन्य कथा में ब्रज की गोपियों द्वारा भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए मां कात्यायनी की उपासना का भी उल्लेख मिलता है।

