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क्या NCP के सीनियर लीडर छगन भुजबल पार्टी छोड़ेंगे या होंगे बीजेपी में शामिल

एनसीपी के दिग्गज नेता रहे भुजबल राज्य में दो बार डिप्टी सीएम रहे चुके हैं और पिछली महायुति और एमवीए दोनों सरकारों में महत्वपूर्ण विभागों में रहे हैं।

by Reeta Rai Sagar
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सेंट्रल डेस्क। महाराष्ट्र राजनीति और गठबंधन की नई मिसालें पेश कर रहा है। मुख्यमंत्री के नाम से लेकर कैबिनेट के विस्तार तक बस हंगामा ही बरपा है। अब भी इस्तीफा और नाराजगी का दौर जारी है। अब खबर है कि एनसीपी के सीनियर नेता छगन भुजबल एनसीपी छोड़ सकते है। दरअसल रविवार को महायुति सरकार के मंत्रियों के शपथ ग्रहण में सबसे बड़ा झटका तब लगा जब छगन भुजबल का नाम कैबिनेट सूची में शामिल नहीं था।
एनसीपी के दिग्गज नेता रहे भुजबल राज्य में दो बार डिप्टी सीएम रहे चुके हैं और पिछली महायुति और एमवीए दोनों सरकारों में महत्वपूर्ण विभागों में रहे हैं। उन्हें भारत में ओबीसी समुदाय के सबसे बड़े नेताओं में से एक माना जाता है। शपथ ग्रहण से पहले भुजबल को कैबिनेट का ‘डिफॉल्ट नाम’ माना जाता था। अब, नाराज भुजबल संकेत दे रहे हैं कि वह जल्द ही अपने राजनीतिक पथ के लिए कोई कठोर निर्णय लेने वाले है।

पार्टी छोड़ने के पीछे की कुछ प्रमुख वजहें

भुजबल ने कहा कि मैं किसी के हाथ का खिलौना नहीं हूं कि मुझे कोई कहे उठ तो उठूं और बैठ तो बैठूं। पार्टी छोड़ने के पीछे उनकी कुछ प्रमुख वजहें है, जैसे कि:-

1) मराठा आंदोलनकारियों के खिलाफ आक्रोश
पिछले साल, जब नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के लिए मराठा आंदोलन हिंसक हो गया था और ओबीसी नेताओं पर हमले हुए, तो भुजबल ने बयान दिया, जिससे महायुति सरकार की चुनौतियां बढ़ गईं। जब सरकार मराठा नेता मनोज जारंगे पाटिल को शांत करने की कोशिश कर रही थी, तब भुजबल (तत्कालीन मंत्री) ने खुले तौर पर जारंगे को निशाना बनाया। यह बात न तो गठबंधन के सहयोगियों को रास आई और न ही उनकी अपनी पार्टी को। भुजबल ने मराठा आंदोलनकारियों के खिलाफ बोलकर ओबीसी नेता के रूप में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन उनकी बयानबाजी ने मराठों को महायुति से और अलग कर दिया। लोकसभा चुनावों में महायुति के निराशाजनक प्रदर्शन के प्रमुख कारणों में से एक मराठों का गुस्सा था।

2) अजित पवार के साथ तनावपूर्ण संबंध
भुजबल नासिक से लोकसभा चुनाव लड़ने के इच्छुक थे। हालांकि, सीट बंटवारे पर चर्चा के दौरान गतिरोध के बाद, अजित पवार ने शिवसेना के हेमंत गोडसे के लिए सीट छोड़ दी, जिससे भुजबल नाराज हो गए। उन्हें राज्यसभा के जरिए संसद में प्रवेश की उम्मीद बनी रही, लेकिन चुनाव के दौरान अजित पवार ने भुजबल की जगह उनकी पत्नी सुनेत्रा को नॉमिनेट किया। उस समय भुजबल की अजित पवार से नाराजगी सार्वजनिक रूप से जाहिर थी।

इसके अलावा, भुजबल के भतीजे समीर ने पार्टी के खिलाफ विद्रोह कर दिया और नंदगांव से महायुति के आधिकारिक उम्मीदवार सुहास कंडे के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। समीर को नामांकन वापस लेने के लिए मनाने में भुजबल की विफलता ने भी उनके खिलाफ काम किया। अजित पवार के करीबी एनसीपी कार्यकर्ता यह तर्क देते है कि भुजबल को मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया है। लेकिन उनको उनका हक दिया गया है। पिछली सरकार में उन्हें मंत्री बनाने के अलावा उनके बेटे पंकज भुजबल को हाल ही में एमएलसी बनाया गया है।

3) अगली पीढ़ी के नेतृत्व के निर्माण की रणनीति
बता दें कि केवल छगन भुजबल ही नहीं ऐसे नेता है, जिन्हें कैबिनेट सूची से हटाया गया था, बल्कि दिलीप वलसे पाटिल और बाबा धर्मराव आत्राम जैसे अन्य दिग्गजों को भी दरकिनार कर दिया गया। इस फैसले को युवा नेतृत्व विकसित करने की पार्टी की रणनीति के तहत सही ठहराया जा रहा है, जिसमें कई नए चेहरों को कैबिनेट में मौका दिया गया। भुजबल के पास अभी भी मंत्री बनने का मौका है, क्योंकि महायुति ने ढाई साल बाद मंत्रियों को बदलने की नीति की घोषणा की है। हालांकि, भुजबल के करीबी लोगों का कहना है कि वह एनसीपी में अपनी सदस्यता पर पुनर्विचार कर रहे हैं। यह एक महीने के भीतर स्पष्ट हो पाएगा कि क्या अजित पवार उन्हें पार्टी में बनाए रखेंगे या भुजबल बीजेपी या एनसीपी (शरद पवार) में शामिल हो सकते हैं।

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