- अवैध प्रवास की खौफनाक हकीकत
अमृतसर : अमेरिका जाने के सपने देखने वाले कई भारतीय युवा जबरदस्त मुश्किलों से गुजर रहे हैं। हाल ही में अमेरिका से डिपोर्ट होकर भारत लौटे युवकों ने अपने अनुभव साझा किए, जिससे साफ होता है कि एजेंट कैसे युवाओं को धोखे से खतरनाक रास्तों पर धकेल रहे हैं।
22 जनवरी को अमेरिका पहुंचे, 12 दिन में वापस भेजे गए
हरियाणा-पंजाब बॉर्डर के गांव चम्मु कला के रहने वाले खुशप्रीत सिंह (18 साल) ने बताया कि उन्होंने 45 लाख रुपये खर्च करके अमेरिका जाने का सपना देखा था। एजेंट ने वादा किया था कि वे सीधे यूरोप होते हुए अमेरिका पहुंच जाएंगे, लेकिन असलियत कुछ और ही थी।
दिल्ली एयरपोर्ट से उड़ान भरने के बाद पहले उन्हें मुंबई भेजा गया। फिर यूरोप पहुंचने के बाद उन्हें “डोंकी” रूट (अवैध प्रवासी मार्ग) के जरिए पैदल जंगलों, दलदल और समुद्र पार कर मेक्सिको पहुंचाया गया। वहां से 22 जनवरी 2025 को अमेरिका में एंट्री की, लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने तुरंत पकड़ लिया और 12 दिनों तक अलग-अलग कैंपों में रखा।
“हमें यातनाएं दी गईं, कई बार करंट लगाया गया और खाने-पीने तक के लाले पड़ गए,” खुशप्रीत ने रोते हुए बताया।
लूट, भूख और मौत के साए में सफर
अमृतसर के सलेमपुरा गांव के रहने वाले दलेर सिंह भी इसी तरह अमेरिका जाने के लिए निकले थे। उन्होंने बताया कि दुबई से होते हुए उन्हें पनामा के रास्ते अमेरिका ले जाया गया। रास्ते में उनके साथ लूटपाट हुई, भूख और प्यास से बेहाल रहना पड़ा, और कई लोग तो इस सफर में जान तक गंवा बैठे।
“जो बीमार पड़ता था, उसे वहीं छोड़ दिया जाता था। अगर कोई ज्यादा विरोध करता, तो उसे गोली भी मार दी जाती थी,” दलेर सिंह ने बताया।
परिवार की बदहाली और आंसू
जब खुशप्रीत सिंह को भारत वापस भेजा गया, तो उनके पिता जसवंत सिंह (57 साल) अपने बेटे को देखकर फफक-फफक कर रो पड़े। उन्होंने कहा, “एजेंट ने हमसे झूठ बोला। हमें भरोसा था कि बेटा सुरक्षित अमेरिका पहुंचेगा, लेकिन उसे इस खतरनाक रास्ते पर धकेल दिया गया।”
सरकार और युवाओं के लिए चेतावनी
इन युवाओं की दर्दनाक कहानी बताती है कि अवैध तरीके से विदेश जाना न केवल जानलेवा है, बल्कि ठगी और यातनाओं से भरा होता है। खुशप्रीत और दलेर सिंह दोनों ने भारत के नौजवानों को चेतावनी दी कि वे सिर्फ लीगल तरीके से ही विदेश जाएं।
इसके अलावा, सरकार को भी चाहिए कि युवाओं के लिए रोजगार के बेहतर अवसर पैदा करे ताकि वे विदेश जाने के बजाय अपने ही देश में उज्ज्वल भविष्य बना सकें।

