Chaibasa : झारखंड और ओडिशा की सीमा पर स्थित सारंडा वन क्षेत्र में मौजूद है झारखंड का शिमला। यह इलाका किरीबुरू और मेघाहातुबुरू का है। किरी का मतलब होता है हाथी। बुरू माने जंगल। किरीबुरू यानी हाथियों का जंगल। इसी तरह, मेघा माने बादल। मेघाहातुबुरू का मतलब जंगल में बादलों वाला गांव। यह दोनों इलाके झारखंड के टूरिज्म को चार चांद लगाते हैं। यहां सूर्यास्त के नजारे मनोरम होते हैं।
यहां यूं तो सैलानी साल भर आते रहते हैं मगर, जनवरी और फरवरी में इनकी तादाद में अचानक इजाफा हो जाता है। अभी बंगाल, बिहार और ओडिशा के अलावा झारखंड के विभिन्न जिलों से पर्यटक यहां आते हैं। पहले यहां का प्राकृतिक मनोरम दृश्य देखने के लिए दुनिया भर से सैलानी आते थे। मगर, जब से यहां नक्सलियों का असर हुआ सैलानी आना कम हो गए थे। सैलानी आते थे मगर, उन्हें हिदायत होती थी कि शाम पांच बजे से पहले इलाका छोड़ दें। लेकिन, इधर बीच सारंडा में नक्सलियों का प्रभाव कम हुआ है। कई नक्सली मारे गए हैं। कइयों ने सरेंडर कर दिया है। इसी बीच अब दोबारा सारंडा का भाग्योदय हो रहा है। झारखंड का पर्यटन विभाग किरीबुरू और मेघाहातुबुरू को दोबारा विश्च के पर्यटन मानचित्र पर लाने की प्लानिंग कर रहा है। इसके तहत यहां गेस्ट हाउस बनाए जाने हैं। सड़कों की मरम्मत होनी है। इसके अलावा, ऐसी आधारभूत संरचनाएं तैयार की जाएंगी, ताकि सैलानियों को आकर्षित किया जा सके।

गुवा तक ट्रेन से जा सकते सैलानी
सारंडा एशिया में सबसे बड़ा साल के पेड़ों का जंगल है। 700 पहाड़ियों से घिरे इस पूरे क्षेत्र को सारंडा और पोड़ाहाट के नाम से जाना जाता है। सारंडा का शाब्दिक अर्थ ही 700 पहाड़ियां है। इसकी बेजोड़ प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के कारण इसे झारखंड का मिनी शिमला कहा जाता है। पूरा इलाका लौह अयस्क के लिए मशहूर है। यहां सेल की खदानें हैं। यहां आने के लिए चाईबासा तक ट्रेन से आना होगा। इसके बाद टैक्सी लेकर किरीबुरू तक जाया जा सकता है। यही नहीं, सैलानी गुवा तक भी ट्रेन से जा सकते हैं। इसके बाद, टैक्सी लेकर किरीबुरू और मेघाहातुबुरू पहुंचा जा सकता है।

करीब 850 वर्ग किलोमीटर में फैला है सारंडा वन
पश्चिमी सिंहभूम जिले के मुख्यालय चाईबासा से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित सारंडा वन करीब 850 वर्ग किलोमीटर में फैला सघन वन क्षेत्र है। खामोशी में डूबे इस जंगल में हरियाली, घाटियां और पहाड़ों का संगम देखने को मिलता है। सारंडा का कुछ हिस्सा ओडिशा की सीमा से भी सटा हुआ है। इसकी प्राकृतिक छटा और सुकून भरा माहौल सैलानियों को मोहित कर देता है। यहां की वादियों में आकर पर्यटक खुद को प्रकृति के बेहद करीब पाते हैं।
किरीबुरू-मेघाहातुबुरू, समीज आश्रम और हिरनी फॉल बना आकर्षण
सारंडा की पहाड़ियों में किरीबुरू और मेघाहातुबुरू पर्यटकों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। यहां की सबसे ऊंची पहाड़ी से सूर्यास्त का नजारा बेहद सुखद एहसास कराता है। वहीं किरीबुरू स्थित हिलटॉप से सूर्योदय देखने का आनंद भी अलग है। इन मनोरम दृश्यों को देखने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में सैलानी पहुंचते हैं। जिला मुख्यालय से लगभग 70 किलोमीटर दूर बंदगांव प्रखंड स्थित हिरनी जलप्रपात भी पर्यटकों को खींच लाता है। लगभग 300 फीट की ऊंचाई से गिरते इस झरने का दृश्य अद्भुत है।
अनूठा है जलप्रपात का नजारा
पर्यटकों की सुविधा के लिए यहां वॉच टावर भी बनाए गए हैं, जहां से पूरे जलप्रपात का नजारा देखा जा सकता है। आनंदपुर प्रखंड स्थित समीज आश्रम शकुन और सुंदर दृश्य मशहूर है। यहां का कण-कण करती कारों नदी बहती पानी और सूर्योदय का प्यार भरे वादियों देखने लायक हैं।
दर्जनों पिकनिक स्पॉट, सारंडा सबसे खास
पश्चिमी सिंहभूम जिले में दर्जनों पिकनिक स्पॉट हैं, लेकिन इनमें सारंडा का स्थान सबसे खास है। पूरे एशिया में प्रसिद्ध यह वन क्षेत्र झारखंड और ओडिशा की सीमा में फैला हुआ है। जिले की 700 पहाड़ियों से घिरी सारंडा की सुंदर श्रृंखला देशभर में चर्चित है।

पर्यटन से रोजगार की योजना
जिला प्रशासन अब सारंडा समेत पूरे जिले के पर्यटन स्थलों को विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। इसका मकसद पर्यटन से आय के स्रोत बढ़ाने के साथ बेरोजगार युवाओं को रोजगार देना और क्षेत्र का विकास करना है। सरकार जंगल और झरनों तक पर्यटकों की पहुंच आसान बनाने पर जोर दे रही है।
ये जगहें पिकनिक स्पॉट के अनुकूल
जिले में सारंडा वन क्षेत्र के अलावा बंदगांव स्थित हिरनी फॉल, नकटी डैम, कंसरा मंदिर, सोनुवा प्रखंड का पनसुआ डैम, टंकुरा मंदिर, बेनीसागर, मंझारी प्रखंड का भागाबिल्ला घाटी, विदनी तालाब, तांतनगर का संगम और मनोहरपुर का समीज आश्रम, दीघा, सामठा जैसे कई पर्यटन स्थल हैं। इन सभी स्थलों को पर्यटन मानचित्र पर लाने की तैयारी है।

बदलते हालात, लौट रहा पर्यटन
एक समय था जब सारंडा घूमने आने वाले लोग कोलकाता से बुकिंग करते थे। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद यहां नक्सल गतिविधियों का असर पड़ा और पर्यटन ठप हो गया। अब सुरक्षा हालात सुधरने के साथ सारंडा फिर से गुलजार हो रहा है। प्रशासन की कोशिश है कि मिनी शिमला की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया जाए, जिससे स्थानीय लोगों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो।

