
मुंबई/ जमशेदपुर : भारतीय लोककला की सबसे सशक्त पहचान मानी जाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई का आज (5 जुलाई 2026) निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही पंडवानी के मंचीय गायन का एक स्वर्णिम अध्याय समाप्त हो गया। छत्तीसगढ़ की मिट्टी से निकलकर विश्वभर में भारतीय लोकसंस्कृति की पहचान बनाने वाली तीजन बाई ने महाभारत की कथाओं को जिस प्रभावशाली शैली में जन-जन तक पहुंचाया, वह उन्हें लोककला के इतिहास में सदैव अमर बनाए रखेगा।
पद्म विभूषण तीजन बाई का जीवन परिचय
7 सितंबर 1956 को हरतालिका तीज के दिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मी तीजन बाई गोंड जनजाति की परधान उपजाति से थीं। उनके पिता हुनुकलाल परधा और माता सुखवती साधारण परिवार से थे। परिवार की आजीविका चटाई और झाड़ू बनाने पर निर्भर थी।
तीजा पर्व के दिन जन्म लेने के कारण उनका नाम ‘तीजन’ रखा गया। बचपन आर्थिक अभाव और सामाजिक रूढ़ियों के बीच बीता, लेकिन इसी संघर्ष ने उनके व्यक्तित्व को असाधारण मजबूती दी।
नाना से मिली पंडवानी की पहली शिक्षा
महज 12 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने नाना ब्रजलाल परधा से पंडवानी सुनना शुरू किया। एक दिन कार्यक्रम से लौटते समय नाना ने उनसे पूछा कि उन्होंने क्या सुना। बालिका तीजन ने महाभारत की पूरी कथा इतनी सहजता और प्रभावशाली ढंग से सुनाई कि नाना उनकी प्रतिभा पहचान गए।
इसके बाद उन्होंने तीजन को पंडवानी की बारीकियां सिखानी शुरू कर दीं। महाभारत की कथाएं, छत्तीसगढ़ी बोली की मिठास और स्वाभाविक अभिनय ने बहुत कम उम्र में ही उनकी अलग पहचान बना दी।
समाज की बंदिशों से लड़कर बनाई अपनी राह
उस समय महिलाओं का मंच पर लोकगायन करना सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं माना जाता था। परिवार ने विरोध किया। उन्हें घर के कामों में लगाने की कोशिश हुई। पंडवानी गाने पर डांट-फटकार और शारीरिक प्रताड़ना तक झेलनी पड़ी।
कम उम्र में विवाह के बाद भी परिस्थितियां नहीं बदलीं। जब एक कार्यक्रम में जाने से पति ने मना किया तो उन्होंने सामाजिक बंधनों को चुनौती देते हुए स्वयं अपना रास्ता चुना। चंद्रखुरी गांव में आयोजित कार्यक्रम ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उसी प्रस्तुति के बाद उन्हें पहली बार मेहनताना मिला, जिससे उन्होंने अपना अलग आशियाना बनाया और आत्मनिर्भर जीवन की शुरुआत की।
पंडवानी को नई पहचान देने वाली कलाकार
तीजन बाई ने केवल पंडवानी का गायन नहीं किया, बल्कि उसकी प्रस्तुति शैली को भी नया आयाम दिया। पारंपरिक वेदमति शैली के विपरीत उन्होंने कापालिक शैली को लोकप्रिय बनाया, जिसमें कलाकार खड़े होकर अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं के साथ कथा प्रस्तुत करता है।
तानपुरा उनके हाथ में केवल वाद्य नहीं बल्कि महाभारत के पात्रों का प्रतीक बन जाता था। कभी वह अर्जुन का गांडीव बनता, कभी भीम की गदा और कभी श्रीकृष्ण का संदेशवाहक। यही शैली उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।
हबीब तनवीर से लेकर इंदिरा गांधी तक सभी हुए प्रभावित
एक कार्यक्रम में प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रस्तुति देखी और उन्हें राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं उनकी प्रस्तुति की सराहना की। इसके बाद उनकी पहचान देशभर में तेजी से फैलने लगी।
दूरदर्शन ने पहुंचाई देश के हर घर तक
वर्ष 1988 में निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल के चर्चित धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में महाभारत प्रसंग के दौरान तीजन बाई की प्रस्तुति ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इसके बाद पंडवानी केवल छत्तीसगढ़ की लोककला नहीं रही, बल्कि पूरे देश की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में स्थापित हुई।
आखिर क्या है पंडवानी?
पंडवानी का अर्थ है ‘पांडवों की वाणी’। यह महाभारत की घटनाओं का लोकगायन है, जिसमें युद्ध, धर्म, नीति, वीरता और मानव जीवन के अनेक पक्षों को गीत और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
पंडवानी की दो प्रमुख शैलियां हैं-
वेदमति शैली
कापालिक शैली
तीजन बाई ने कापालिक शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया और इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
भारत की सांस्कृतिक दूत बनीं तीजन बाई
तीजन बाई ने चार दशक से अधिक समय तक देश और विदेश में भारतीय लोककला का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने जापान, जर्मनी, इंग्लैंड, स्विट्जरलैंड, इटली, रूस, चीन सहित 40 से अधिक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर भारतीय संस्कृति का परचम लहराया।
उनकी प्रस्तुतियों ने यह साबित किया कि लोककला केवल मनोरंजन नहीं बल्कि भारतीय इतिहास, संस्कृति और परंपरा की जीवंत विरासत है।
बीमारी के बाद भी नहीं छोड़ा मंच
साल 2018 में उन्हें हृदयाघात आया था। उपचार के बाद उन्होंने फिर से मंच पर वापसी की और अंतिम वर्षों तक लगातार प्रस्तुतियां देती रहीं। उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद कला के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ।
पद्म विभूषण सहित मिले अनेक सम्मान
भारतीय लोककला में असाधारण योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले।
1988 – पद्मश्री
1995 – संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2003 – पद्म भूषण
2003 – डी.लिट् (बिलासपुर विश्वविद्यालय)
2007 – नृत्य शिरोमणि सम्मान
2016 – एम. एस. सुब्बालक्ष्मी शताब्दी सम्मान
2018 – फुकुओका पुरस्कार (जापान)
2019 – पद्म विभूषण
भारतीय लोककला की अपूरणीय क्षति
तीजन बाई ने यह सिद्ध किया कि प्रतिभा सामाजिक बंधनों से कहीं बड़ी होती है। उन्होंने ग्रामीण लोकपरंपरा को वैश्विक मंच तक पहुंचाया और पंडवानी को नई पीढ़ियों के लिए जीवंत बनाए रखा।
उनके निधन से भारतीय लोकसंगीत, छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत और पंडवानी परंपरा को अपूरणीय क्षति पहुंची है। उनकी आवाज, उनकी प्रस्तुति शैली और महाभारत के पात्रों को जीवंत कर देने वाली उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

