
रांची : झारखंड उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कहा है कि किसी नक्सली की पत्नी होना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। कोर्ट ने 19 साल पुराने एक मामले में सुनवाई करते हुए प्रमिला देवी नामक महिला को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है।
गुमला की एक निचली अदालत ने साल 2007 में प्रमिला देवी को हत्या के प्रयास, सरकारी काम में बाधा डालने, लूट का सामान रखने और आर्म्स एक्ट जैसी गंभीर धाराओं में दोषी पाया था। तब उन्हें 8 साल की जेल की सजा सुनाई गई थी। इस फैसले के खिलाफ प्रमिला देवी ने हाईकोर्ट में अपील की थी।
हाईकोर्ट की जस्टिस अनुभा रावत चौधरी की अदालत ने निचली अदालत के उस पुराने फैसले और सजा को पूरी तरह रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि निचली अदालत ने मामले की कई जरूरी पहलुओं पर ठीक से ध्यान नहीं दिया था, इसलिए वह फैसला कानून सम्मत नहीं है।
गुमला के निनार गांव में हुई थी पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़
2004 में गुमला जिले के बिशुनपुर क्षेत्र के निनार गांव में पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी। पुलिस का दावा था कि इस मुठभेड़ में दो नक्सली मारे गए थे। जबकि प्रमिला देवी और एक अन्य महिला को मौके से पकड़ा गया था। पुलिस के मुताबिक, प्रमिला देवी एक प्रतिबंधित संगठन के सब-जोनल कमांडर प्रतुल भुइयां की पत्नी हैं।
हाईकोर्ट ने केस के सारे रिकॉर्ड और सबूतों को देखकर पाया कि पुलिस प्रमिला देवी के पास से कोई भी हथियार या आपत्तिजनक सामान बरामद होने की बात साबित नहीं कर पाई।
प्रमिला के खिलाफ किसी भी तरह की हिंसक या आपराधिक गतिविधि में शामिल होने का कोई सीधा सबूत नहीं था। कोर्ट ने कहा कि घटना के समय महिला की गोद में डेढ़ साल की बच्ची थी। सिर्फ मौके पर मौजूद होना या किसी नक्सली की पत्नी होना किसी को अपराधी साबित करने के लिए काफी नहीं है। पुलिस यह भी साबित नहीं कर सकी कि वह संगठन की एक्टिव मेंबर थीं।
प्रमिला देवी पहले ही करीब पौने आठ साल जेल में बिता चुकी हैं और 2011 में सजा पूरी कर बाहर आ चुकी थीं। लेकिन अब हाईकोर्ट के इस फैसले ने उन्हें बेदाग बरी कर एक बड़ी राहत दी है।
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