
Ranchi : राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) की सदस्य डॉ. आशा लकड़ा ने बुधवार को रांची विश्वविद्यालय और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (डीएसपीएमयू) का दौरा कर जनजातीय विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों से जुड़े विभिन्न मामलों की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने दोनों विश्वविद्यालयों के अधिकारियों को सात दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट आयोग को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया।
डॉ. आशा लकड़ा ने कहा कि आयोग इस रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार, दोनों विश्वविद्यालयों और यूजीसी को आवश्यक अनुशंसाएं भेजेगा, ताकि जनजातीय छात्रों, प्रोफेसरों और कर्मचारियों से जुड़े मामलों का समाधान सुनिश्चित किया जा सके।
समीक्षा के दौरान उन्होंने कहा कि दोनों विश्वविद्यालयों के पास नियुक्ति, पदोन्नति और वेतन निर्धारण जैसे मामलों में स्वतंत्र अधिकार नहीं हैं। प्रोफेसरों की नियुक्ति, पदोन्नति, छात्रवृत्ति और अन्य प्रशासनिक फैसले पूरी तरह राज्य सरकार के स्तर पर लिए जाते हैं। विश्वविद्यालयों के पास अपनी अलग नियमावली नहीं होने से कई महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय लंबित हैं।
उन्होंने बताया कि जनजातीय प्रोफेसरों की नियुक्ति के लिए झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) द्वारा परीक्षा आयोजित की गई थी, लेकिन अब तक उसका परिणाम घोषित नहीं किया गया है। वहीं कई योग्य प्रोफेसर पिछले दस वर्षों से पदोन्नति का इंतजार कर रहे हैं। चतुर्थवर्गीय कर्मचारियों का वेतन निर्धारण भी वर्षों से लंबित है, जबकि अनुकंपा के आधार पर नियुक्त उच्च शिक्षित कर्मचारियों को भी पदोन्नति नहीं मिल सकी है।
डॉ. आशा लकड़ा ने विश्वविद्यालयों में लागू क्लस्टर सिस्टम पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि खड़िया और संताली भाषा को एक साथ जोड़ देने से विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। यदि क्लस्टर सिस्टम लागू करने से पहले संबंधित पक्षों के साथ बैठक होती तो जनजातीय छात्रों के हित में बेहतर निर्णय लिया जा सकता था।
उन्होंने यह भी बताया कि हर वर्ष जनजातीय विभाग के 25 से 30 विद्यार्थी जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) के लिए चयनित होते हैं, लेकिन शोध मार्गदर्शक (गाइड) की कमी के कारण वे पीएचडी पूरी नहीं कर पाते। इससे भविष्य में जनजातीय विषयों के लिए योग्य प्रोफेसरों की भी कमी बनी हुई है।
आयोग ने विश्वविद्यालय प्रबंधन को निर्देश दिया कि स्नातक (यूजी) और स्नातकोत्तर (पीजी) दोनों स्तरों पर जनजातीय टॉपर विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जाए। वर्तमान में कल्याण विभाग की ओर से केवल पीजी टॉपर को ही छात्रवृत्ति दी जा रही है।
बैठक में विश्वविद्यालयों में जनजातीय विद्यार्थियों और कर्मचारियों से जुड़े उत्पीड़न एवं अत्याचार की शिकायतों पर भी चर्चा हुई। आयोग ने प्रत्येक विश्वविद्यालय में इंटरनल ग्रीवांस रिड्रेसल सेल गठित करने, हर तीन महीने में समीक्षा बैठक आयोजित करने तथा प्रशिक्षित लाइजन ऑफिसर नियुक्त करने का निर्देश दिया, ताकि नियुक्ति और पदोन्नति में आरक्षण रोस्टर का सही तरीके से पालन सुनिश्चित हो सके।
डॉ. आशा लकड़ा ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि यूजीसी की गाइडलाइन के अनुरूप विश्वविद्यालयों को अधिक प्रशासनिक अधिकार दिए जाएं, जिससे जनजातीय छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान विश्वविद्यालय स्तर पर ही समय पर किया जा सके।

