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Jharkhand High Court: तेरह साल से सेवा दे रहे 10 असिस्टेंट इंजीनियर होंगे कन्फर्म, झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार को दिया 10 हफ्ते का अल्टीमेटम

हाई ​कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विज्ञापनों और चयन प्रक्रिया के जरिए चुने गए कर्मचारियों को सिर्फ 'कॉन्ट्रैक्ट' का ठप्पा लगाकर उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

by Kanchan Kumar
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रांची : संविदा पर नौकरी कर रहे 10 सहायक अभियंताओं को दिवाली का बड़ा तोहफा मिल गया है। झारखंड उच्च न्यायालय ने एक उन सहायक अभियंताओं के पक्ष में बड़ा आदेश दिया है जो पिछले 13 वर्षों से संविदा सेवाएं देते आ रहे थे। अदालत ने कहा है कि इतने लंबे समय तक बिना किसी रुकावट के काम करने वाले कर्मचारियों को सिर्फ कागजी तौर पर संविदा बताकर उनके नियमितीकरण के हक को छीना नहीं जा सकता।

​यह पूरा वाकया साल 2012 का है। झारखंड स्टेट रूरल रोड डेवलपमेंट अथॉरिटी ने ग्रामीण इलाकों में सड़कों के विकास और सुदृढ़ीकरण के लिए 22 जुलाई 2012 को एक विज्ञापन निकाला था। इसमें सिविल इंजीनियरिंग में बीई या बीटेक की डिग्री रखने वाले योग्य युवाओं से आवेदन मांगे गए थे।
​पूरी चयन प्रक्रिया और पारदर्शिता के साथ मेरिट लिस्ट तैयार करने के बाद, साल 2013 में इन 10 इंजीनियरों को नियुक्ति पत्र सौंपे गए। हालांकि, नियुक्ति के वक्त इन्हें परमानेंट के बजाय कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया था। लेकिन समय बीतता गया और इनकी सेवाएं साल-दर-साल लगातार रिन्यू होती गईं।

​सरकार और अथॉरिटी की दलीलें

​जब इन इंजीनियरों ने अपनी सेवा को नियमित करने की मांग उठाई तो राज्य सरकार और जेएसआरआरडीए ने इसका पुरजोर विरोध किया। उनका तर्क था कि ​ये नियुक्तियां विशेष रूप से प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के भारी काम को संभालने के लिए संविदा पर की गई थीं।
​नियुक्ति पत्र में साफ तौर पर यह शर्त थी कि भविष्य में नियमितीकरण का दावा नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध उमा देवी मामले का हवाला देते हुए सरकार ने कहा कि इस तरह के मामलों में सीधी पक्की नौकरी नहीं दी जा सकती।

​इंजीनियरों का पक्ष और अदालत की कड़ी टिप्पणी

​दूसरी तरफ, याचिकाकर्ता इंजीनियरों का कहना था कि वे पूरी तरह से स्वीकृत और रिक्त पदों पर काम कर रहे हैं। वे एक नियमित सहायक इंजीनियर की तरह ही सारी जिम्मेदारियां निभा रहे थे। यही नहीं, विभाग ने उन्हें सातवें वेतन आयोग का लाभ देते हुए उनका ग्रेड पे भी बढ़ा दिया था। यानी वेतन और काम तो परमानेंट कर्मचारियों वाला था, लेकिन नाम कॉन्ट्रैक्ट का था।

​मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने और महत्वपूर्ण फैसलों जैसे भोलानाथ बनाम झारखंड राज्य मामले का हवाला दिया। अदालत ने साफ किया कि अगर कोई कर्मचारी खुले विज्ञापन और पूरी चयन प्रक्रिया के जरिए आया हो, जरूरी योग्यता रखता हो और एक दशक से ज्यादा समय से अपनी सेवाएं दे रहा हो, तो उसे सिर्फ संविदा का नाम देकर उसके हक से रोका नहीं किया जा सकता।

​झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और संबंधित विभागों को सख्त निर्देश जारी किए हैं। इसके अनुसार इन सभी 10 सहायक अभियंताओं की सेवाएं उस तारीख से नियमित मानी जाएं, जब इन्होंने अपनी सेवा के 10 साल पूरे किए थे।
​इन्हें एक नियमित कर्मचारी की तरह मिलने वाले सभी लाभ जैसे एरियर, प्रमोशन या अन्य भत्ते दिए जाएं। साथ ही कहा है कि इस पूरे आदेश को फैसले की कॉपी मिलने के महज 10 सप्ताह के भीतर हर हाल में लागू करना होगा।
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