
रांची: बिरसा मुंडा एयरपोर्ट का वो मुहाना रविवार को सिर्फ एक हवाई अड्डा नहीं रह गया था। वह उम्मीदों, संघर्ष और सुनहरे इतिहास के संगम का जीवंत मुकाम बन चुका था। हवा में ढोल मांदर की गूंज थी और हर ओर जश्न का माहौल। आंखों में अपने ही आंगन की बेटियों को तिरंगे के साये में देखने का उल्लास। जापान के आइची-नागोया में 44 बरस का सूखा खत्म कर, एशियाई खेल 2026 में चीन को पछाड़कर गोल्ड जीतने वाली भारतीय महिला हॉकी टीम के चार अनमोल रतन- कप्तान सलीमा टेटे, अनुभवी निक्की प्रधान, ब्यूटी डुंगडुंग और युवा दीपिका सोरेंग जब बेंगलुरु की उड़ान से उतरकर रांची की पावन माटी पर कदम रख रही थीं, तो मंजर देखने लायक था।
एयरपोर्ट परिसर में गूंजे भारत माता के जयकारे
जैसे ही स्वचालित दरवाजे खुले और गले में चमकता स्वर्ण पदक टांगे चारों बेटियां बाहर निकलीं, एयरपोर्ट परिसर भारत माता के जयकारों और झारखंड की बेटियां के जिंदाबाद’ के नारों से गूंज उठा। सामने कतारबद्ध खड़े नन्हे हॉकी खिलाड़ियों ने जब अपनी-अपनी हॉकी स्टिक को हवा में उठाकर अपनी नायिकाओं को गार्ड ऑफ ऑनर दिया, तो वो दृश्य हर खेल प्रेमी की आंखों में गर्व के आंसू तैरने के लिए काफी था। ताजी गेंदे के फूलों की महक और मालाओं के बीच सलीमा का सादगी भरा मुस्कुराता चेहरा बता रहा था कि सिमडेगा-खूंटी की लाल मिट्टी से निकला यह सफर आज किस बुलंदी पर पहुंच चुका है।
पिता की नम आंखें बिना कुछ बोले ही सब बयां कर गईं
पर उस पूरे उल्लास के बीच सबसे दिल छू लेने वाला पल वो था, जब मैदान पर फौलाद की तरह मजबूत नजर आने वाली ये बेटियां अपने परिजनों के सामने आईं। महीनों की कड़ी ट्रेनिंग और महाद्वीप को जीतने की थकान जैसे एक पल में काफूर हो गई, जब बेटियों ने झुककर माता-पिता के पांव छुए। माताओं ने अपनी बेटियों को आंचल में भींच लिया और पिता की नम आंखें बिना कुछ बोले ही सब बयां कर गईं। अपनों के हाथों से मिली मिठाई का हर निवाला उस कड़े संघर्ष की मिठास जैसा लग रहा था, जो इन लड़कियों ने लाल मिट्टियों के उबड़-खाबड़ मैदानों से शुरू किया था।

इस ऐतिहासिक घड़ी का साक्षी बनने के लिए खेल प्रशासन से लेकर गांव-देहात से आए खेल प्रेमी उमड़ पड़े थे। हॉकी झारखंड के मनोज कोनबेगी, अस्रिता लकड़ा, विजय शंकर सिंह से लेकर पूर्व दिग्गज सावित्री पूर्ति और सुमराय टेटे तक-हर चेहरा इस बात की गवाही दे रहा था कि यह स्वागत केवल चार खिलाड़ियों का नहीं, बल्कि झारखंड की उस जिद्दी हॉकी परंपरा का है जो अभावों में भी सिर्फ सोना तराशना जानती है।
सलीमा की कप्तानी में रची गई सुनहरी इबारत
सलीमा की कप्तानी में रची गई इस सुनहरी इबारत ने न सिर्फ 44 सालों के इंतजार को खत्म किया है, बल्कि राज्य की हजारों-लाखों छोटी बच्चियों के हाथों में थमी हॉकी स्टिक को एक नया हौसला दे दिया है। रविवार को रांची का आसमान जिस गर्व से गुंजायमान था, वह चीख-चीखकर कह रहा था-यह तो बस शुरुआत है, झारखंड की ये बेटियां अभी दुनिया के और भी कई मैदान फतेह करने वाली हैं।
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