
मैं यहां नेताजी सुभाषचंद्र बोस की बात नहीं कर रहा हूं। मैं उसकी चर्चा कर रहा हूं, जिसे अचानक भीड़ का जुगाड़ करने के लिए जाना जाता है। न जाने कितने लोग इनकी भीड़ से नेतागीरी चमका चुके हैं, लेकिन अब ये खुद लंबे समय से हाशिए पर हैं। चारों घाट घूमने के बाद अब ये मूल दल में आ चुके हैं, अब जिस पत्तल में खाया… मुहावरे को चरितार्थ कह रहे हैं। लंबे समय से कोमा में चल रहे नेताजी को तब होश आया, जब इनके इलाके में तोड़फोड़ हो गई। लंबे समय तक कूड़ा-करकट यूनियन चलाने वाले नेता ने फिर भीड़ जुटा ली। शोरगुल मचाया। अगले दिन कंबल आदि भी बांटे। दूसरे दिन एक नए नेता ने भी उन्हीं लोगों में कंबल बंटवा दिया। ये अब अपने नेतृत्व को ही ललकारने लगे, तो मुकदमा हो गया है। अब नेताजी फिर कोमा में चले गए।
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फ्लाईओवर बना अखाड़ा
राजनीति करने के लिए मुद्दा कुछ भी हो सकता है, यह अपने शहर के नेताओं को बताने की जरूरत नहीं है। जनहित की बात पर तो कई लोग राजनीति करते हैं, जनता को शॉक पहुंचाने वाली राजनीति भी कर लेते हैं। हाल ही में ऐसा फ्लाईओवर के मामले में दिखा। कुछ लोग अपनी दुकानदारी ठप होने की वजह से पहले चार-चार रैम्प बनाने को लेकर मुद्दा बना चुके थे, तो थोड़ी ही दूर पर एक और फ्लाईओवर के लिए खोदाई शुरू होते ही बवाल मचा दिया। मुद्दा वही, दुकानदारी चौपट हो जाएगी। इसमें जब विरोधी भी डबल तेवर से आक्रामक हुआ, तो चौबीस घंटे बाद खोदाई शुरू हो गई। अभी यह पता नहीं चला है कि फ्लाईओवर बनने के बाद दुकानदारी चौपट होगी कि नहीं। इस बात का भी पता नहीं चला कि किस अदृश्य शक्ति के दबाव में जब- तब फ्लाईओवर का पिलर हिलाया जाता है।
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सरताज या कब्रगाह
शहर की जनसुविधा को देखने की जिम्मेदारी जिस संस्था पर है, उसे बीच-बीच में जबरदस्त कोपभाजन का शिकार भी बनना पड़ता है। कभी उसे सरताज बना दिया जाता है, तो कभी कब्रगाह बताकर लानत-मलामत कर दी जाती है। शायद, संस्था के मुखिया की चमड़ी काफी मोटी हो गई है, वरना कब इस्तीफा देकर निकल जाते। यदि ऐसा नहीं होता तो अदालत से बार-बार मिलने वाली कड़ी फटकार का कुछ तो असर होता ही। शायद, उन्हें भी पता है कि वह बड़े खिलाड़ियों का मोहरा भर है। जब सचमुच हंटर चलेगा, तो पहले आकाओं की पीठ छिलेगी। उसके बाद जो होगा देखा जाएगा, अभी तो गेहूं के घुन की तरह पिसने में ही भलाई है। एक ही बिल्डिंग को बार-बार सील करते हुए वे थक गए हैं। खास बिल्डिंग की तरफ नहीं देखना है, यह भी उन्होंने रट लिया है। कमजोर की लुगाई, सबकी भौजाई होती ही है।
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चालाक भतीजा का काम
शहर की राजनीति में चाचा-भतीजा अब भी प्रासंगिक बने हुए हैं। कुछ दिन पहले ही चतुर चाचा के समर्थकों ने एक बार फिर चालाक भतीजे के किए-कराए का लेखा-जोखा उजागर करने की तैयारी शुरू कर दी है। इतना भारी काम वे खुद नहीं कर सकते, इसलिए सरकारी मशीनरी का उपयोग करने की योजना बनाई है। अब पता नहीं, सरकार में बैठे लोग अपने दैनिक कामकाज को निपटाएंगे या पंचवर्षीय योजना से इस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए भेज देंगे। बहरहाल, चालाक भतीजा का काम हर चौक-चौराहे से लेकर गली-नुक्कड़ तक लगे हरे-हरे होर्डिंग बोर्ड पर दिख रहा है। ट्रांसफॉर्मर से लेकर ईंट की दीवार तक भतीजा अमर होता हुआ दिख रहा है। अब सिर्फ इन्हीं होर्डिंग बोर्ड और गली के मुहानों पर लगे शिलापट की गिनती हो जाए, तो आधा काम हो जाएगा। रह जाएंगी फाइलें, जिसे खंगालने पर अदृश्य कार्य भी दिख सकते हैं।
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