
रांची: झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की सहायक आचार्य नियुक्ति परीक्षा (विज्ञापन संख्या 04/2026) के नए नियम कानूनी अड़चनों में फंस गए हैं। राम प्रकाश यादव और अन्य पारा शिक्षकों ने बहाली प्रक्रिया की कुछ विवादित शर्तों को चुनौती देते हुए झारखंड हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से आरक्षण प्रणाली, अनारक्षित (जनरल) पदों पर चयन की प्रक्रिया और न्यूनतम कटऑफ अंकों से जुड़े नियमों पर कड़ा ऐतराज जताया है।
आरक्षित वर्ग के मेधावी अभ्यर्थियों पर रोक का विरोध
अदालत में दायर याचिका में विज्ञापन की उस विशेष शर्त को निशाने पर लिया गया है, जिसके तहत आरक्षित श्रेणी के न्यूनतम अंकों के आधार पर जेटेट या अन्य टीईटी पास करने वाले अभ्यर्थियों को केवल आरक्षित पदों के लिए ही योग्य माना जा रहा है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि कोई अभ्यर्थी अपनी प्रतिभा और मेरिट के बल पर अनारक्षित पदों की कटऑफ हासिल करता है, तो उसे जनरल सीटों पर चयन का अवसर मिलना चाहिए। उन्हें महज इस आधार पर बाहर रखना पूरी तरह अनुचित है कि उन्होंने पात्रता परीक्षा आरक्षित श्रेणी के अंकों से पास की है।
पिछड़ा वर्ग की शून्य सीटों पर सवाल
अदालत के समक्ष यह मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया गया है कि भर्ती विज्ञापन में अत्यंत पिछड़ा वर्ग-I और पिछड़ा वर्ग-II के लिए पद शून्य दर्शाए गए हैं। याचिका के अनुसार कक्षा 1 से 5 तक के इंटरमीडिएट प्रशिक्षित सहायक आचार्य के 1,909 पद और
स्नातक प्रशिक्षित सामाजिक विज्ञान के 660 नियमित पदों में पिछड़ा वर्ग के लिए एक भी रिक्ति नहीं दी गई है।
शिक्षकों ने सवाल उठाया है कि जब इन वर्गों के लिए सीटें ही उपलब्ध नहीं हैं, तो मेधावी उम्मीदवारों को जनरल सीटों से बेदखल करना उनके अधिकारों का हनन है।
रोस्टर सार्वजनिक करने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से गुहार लगाई है कि विवादित शर्तों को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाए और योग्य अभ्यर्थियों को मेरिट के आधार पर अनारक्षित पदों में दावेदारी का मौका मिले। इसके साथ ही, पिछड़ा वर्ग की शून्य सीटें तय करने के आधार को स्पष्ट करने के लिए सरकार और आयोग को निर्देश दिया जाए कि वे मूल आरक्षण रोस्टर और पिछली नियुक्तियों का श्रेणीवार ब्योरा हाईकोर्ट के सामने प्रस्तुत करें।
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