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Kolhan Region Railway Stations : जानिए, कैसे रखे गए कोल्हान क्षेत्र के रेलवे स्टेशनों के नाम, दिलचस्प हैं कहानियां

धालभूमगढ़ स्टेशन का नाम राजा धवल सिंहदेव के नाम पर रखा गया। धालभूम क्षेत्र का इतिहास सम्राट अकबर से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने राजा मान सिंह को तीन इलाकों (बीरभूम, मानसून व सिंहभूम) को दान में दिया था।

by Rakesh Pandey
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जमशेदपुर : झारखंड के कोल्हान क्षेत्र में रेलवे स्टेशन केवल यात्रा के केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये क्षेत्र के इतिहास, संस्कृति और परंपराओं के भी जीवंत प्रमाण हैं। इन स्टेशनों के नामकरण के पीछे कई दिलचस्प और ऐतिहासिक कहानियां जुड़ी हुई हैं। आइए जानते हैं, इन स्टेशनों के नामकरण के कुछ खास किस्से।

टाटानगर

टाटानगर स्टेशन का नाम कालीमाटी गांव से पड़ा था, जो टाटा स्टील की स्थापना स्थल साकची के पास स्थित था। 1907 में कालीमाटी स्टेशन का निर्माण हुआ, लेकिन जनवरी 1919 में जब बंगाल के गर्वनर लॉर्ड चेम्सफोर्ड यहां आए, तो उन्होंने टाटा स्टील के संस्थापक जमशेदजी टाटा के सम्मान में कालीमाटी का नाम बदलकर टाटानगर और साकची का नाम जमशेदपुर रखा। इस प्रकार एक छोटे से गांव का नाम टाटानगर रेलवे स्टेशन में बदल गया।

चक्रधरपुर स्टेशन

चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन का नाम पोड़ाहाट राजघराने के राजा घनश्याम सिंहदेव की प्रेरणा से रखा गया। राजा ने 1820 में अपने पिता चक्रधारी सिंहदेव के नाम पर इस शहर की स्थापना की थी। इस कारण चक्रधरपुर शहर और रेलवे स्टेशन का नाम उनके पिता के नाम पर रखा गया।

चाईबासा

चाईबासा का नामकरण चोयों देवगम से हुआ। चाईबासा के शिक्षाविद राउतू पुरती बताते हैं कि पहले यहां चोयों देवगम नामक व्यक्ति का ही घर था। बाद में अंग्रेजों ने इस जगह का विस्तार किया और उसके नाम पर ही शहर का नाम चोयों बासा (घर) रखा, जो बाद में चाईबासा हो गया। यहां चोयों देवगम की समाधि भी है। चाईबासा रेलवे स्टेशन का निर्माण 1970 के दशक में हुआ था।

झींकपानी

झींकपानी स्टेशन का नाम पहले जिनकीपाई था, जो हो भाषा में तालाब को ‘पाई’ और जोड़ा को ‘जिनकी’ कहा जाता है। यह नाम उस स्थान के दो बड़े तालाबों के कारण पड़ा था। कालांतर में जिनकीपाई का नाम बदलकर झींकपानी हो गया और यह स्थान सीमेंट कारखाने के कारण प्रसिद्ध हो गया।

चांडिल

चांडिल स्टेशन का पहले नाम चांदडीह था। यह नाम चांदडीह का अपभ्रंश होकर चांडिल हो गया। इस बात की पुष्टि इसके आसपास के स्टेशनों जैसे नीमडीह, बिरामडीह, कांटाडीह से होती है, जहां ‘डीह’ शब्द का प्रयोग टोले के लिए किया जाता है।

आदित्यपुर

आदित्यपुर स्टेशन का नाम सरायकेला के राजा आदित्य प्रताप सिंहदेव के नाम पर रखा गया था। यह क्षेत्र सरायकेला राजघराने के अधीन आता था और इसे टाटानगर का उपनगर भी कहा जाता है। आदित्यपुर रेलवे स्टेशन एशिया के सबसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र के पास स्थित है, जहां टाटा स्टील का रेलवे साइडिंग और यार्ड भी है।

गम्हरिया

गम्हरिया का नाम ‘गामे रेया’ से लिया गया है, जो हो भाषा के शब्द हैं। ‘गामे’ का अर्थ बारिश और ‘रेया’ का अर्थ बारिश के बाद की ठंडक होता है। कोल्हान क्षेत्र में जिन स्थानों पर हाट लगते थे, वहां बारिश और ठंडक का अनुभव होता था, जिससे इन स्थानों का नाम गामेरेया पड़ा, जो बाद में गम्हरिया में बदल गया।

सीनी

सीनी स्टेशन का नामकरण एक दिलचस्प कहानी से जुड़ा है। यह नाम हो समुदाय के शब्द ‘सिनि’ से लिया गया है, जिसका अर्थ सुंदर कन्या होता है। शुरू में इसे अंग्रेजी में ‘सिनि’ के रूप में लिखा जाता था, लेकिन हिंदी में इसे ‘सीनी’ के रूप में लिखा गया। इस स्टेशन का निर्माण 1923 में हुआ था, जब यहां एक बड़ा रेलवे वर्कशॉप और ट्रेनिंग सेंटर खोला गया।

धालभूमगढ़

धालभूमगढ़ स्टेशन का नाम राजा धवल सिंहदेव के नाम पर रखा गया। धालभूम क्षेत्र का इतिहास सम्राट अकबर से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने राजा मान सिंह को तीन इलाकों (बीरभूम, मानसून व सिंहभूम) को दान में दिया था। इनमें से एक था धालभूम, जो सिंहभूम का अंश था। इसके बाद यह क्षेत्र धालभूमगढ़ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कांड्रा

कांड्रा स्टेशन का पहले नाम कंदरा था, जो यहां के घने जंगलों और गुफाओं के कारण पड़ा था। यहां के लोगों का मानना था कि इन गुफाओं में बाघ और चीते जैसे जंगली जानवर रहते थे, जिससे लोग यहां जाने से डरते थे। इस कारण कंदरा (गुफा) नाम बाद में कांड्रा में हो गया।

इन रेलवे स्टेशनों के नामकरण की कहानियां न केवल कोल्हान क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को उजागर करती हैं, बल्कि ये लोक संस्कृति और भाषा की गहरी समझ भी प्रदान करती हैं। इन नामों में छिपे अर्थ और कहानियां इस क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखते हैं।

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