
फीचर डेस्क : हिंदू धर्म में मनुष्य के जीवन से जुड़े चार प्रमुख ऋण बताए गए हैं-देवऋण, ऋषिऋण, पितृऋण और समाजऋण। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन ऋणों का निर्वहन मनुष्य के प्रमुख कर्तव्यों में शामिल है। इनमें पितृऋण को पूरा करने के लिए श्राद्ध और तर्पण की परंपरा बताई गई है। माता-पिता और परिवार के अन्य दिवंगत सदस्यों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने तथा उनके निमित्त धार्मिक कर्म करने की परंपरा को श्राद्ध कहा जाता है।
पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस अवधि में पितरों के निमित्त किए गए तर्पण, पिंडदान, दान और श्राद्धकर्म से उन्हें शांति और सद्गति प्राप्त होती है। वहीं, आधुनिक समय में श्राद्ध को लेकर अलग-अलग विचार भी देखने को मिलते हैं। धार्मिक परंपरा में इसकी व्याख्या आस्था और शास्त्रीय मान्यताओं के आधार पर की जाती है।
Pitru Paksha 2026 कब से शुरू होगा?
इस वर्ष पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर 2026, शनिवार से हो रही है। पितृपक्ष का समापन 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा। इस अवधि में पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं।
पितृपक्ष के दौरान प्रत्येक दिन का अपना धार्मिक महत्व माना जाता है। जिस तिथि को परिवार के किसी दिवंगत सदस्य का निधन हुआ हो, उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करने की परंपरा है। यदि मृत्यु की तिथि ज्ञात न हो तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है।
श्राद्ध का अर्थ क्या है
सनातन संस्था की ओर से बताया गया कि ‘श्राद्ध’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘श्रद्धा’ से मानी जाती है। धार्मिक दृष्टि से अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ किए जाने वाले कर्म को श्राद्ध कहा जाता है। ब्रह्म पुराण में श्राद्ध की व्याख्या करते हुए उचित स्थान, समय, योग्य पात्र और श्रद्धा के साथ पितरों के निमित्त दान करने का उल्लेख मिलता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्राद्ध केवल एक कर्मकांड नहीं बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। इसी कारण पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्व बताया गया है।
श्राद्धकर्म का इतिहास क्या है
धार्मिक ग्रंथों में श्राद्ध परंपरा का संबंध अत्रि ऋषि से बताया गया है। मान्यता के अनुसार, अत्रि ऋषि ने निमि को ब्रह्मा द्वारा बताई गई श्राद्ध विधि का ज्ञान दिया था। आगे चलकर यह परंपरा विभिन्न पीढ़ियों में चली।
धार्मिक ग्रंथों में मनु द्वारा श्राद्धकर्म किए जाने का भी उल्लेख मिलता है। इसी कारण मनु को ‘श्राद्धदेव’ कहा जाता है। रामायण से जुड़ी मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीराम ने वनवास के दौरान अपने पिता राजा दशरथ के निधन का समाचार मिलने के बाद उनके लिए श्राद्धकर्म किया था।
वैदिक परंपरा में पितृपूजा के विभिन्न रूपों का उल्लेख मिलता है। अग्नि में आहुति, पिंड से संबंधित कर्म और ब्राह्मण भोजन जैसी परंपराओं को श्राद्धकर्म के विभिन्न अंगों के रूप में देखा गया है।
पितृपक्ष में श्राद्ध क्यों किया जाता है
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष में श्राद्ध करने का उद्देश्य दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करना और उनके लिए शांति एवं सद्गति की कामना करना है। पितरों के निमित्त तर्पण, पिंडदान और दान करने की परंपरा इसी धार्मिक विश्वास से जुड़ी है।
हिंदू धर्म की मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने से परिवार और आने वाली पीढ़ियों में अपनी परंपरा तथा संस्कारों के प्रति जागरूकता बनी रहती है। श्राद्धकर्म को इसी दृष्टि से पितृऋण के निर्वहन का माध्यम माना जाता है।
पितृपक्ष में श्राद्ध करने की विधि और महत्व
पितृपक्ष के दौरान दिवंगत व्यक्ति की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है। धार्मिक विधि में तर्पण, पिंडदान, पितरों का स्मरण, दान और भोजन कराने जैसे कर्म शामिल हो सकते हैं। अलग-अलग परंपराओं और परिवारों में श्राद्ध की विधि में अंतर भी पाया जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि प्रतिदिन महालय श्राद्ध करना संभव न हो तो संबंधित पितर की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध किया जा सकता है। जिन लोगों को अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करने की परंपरा है।
पितृपक्ष में नवमी तिथि का क्या महत्व है
पितृपक्ष की नवमी तिथि को ‘अविधवा नवमी’ के नाम से भी जाना जाता है। ऐसी धार्मिक परंपरा है कि जिन सुहागिन महिलाओं की मृत्यु उनके पति से पहले हुई हो, उनके निमित्त इस दिन श्राद्ध किया जाता है।
धार्मिक मान्यताओं में इस तिथि को दिवंगत सुहागिन महिलाओं के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए विशेष माना गया है। परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विशेष कर्म किए जाते हैं।
पितृपक्ष में भगवान दत्तात्रेय का नामजप क्यों किया जाता है?
पितृपक्ष के दौरान भगवान दत्तात्रेय के नामस्मरण की भी परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, दत्तात्रेय का नामजप पूर्वजों की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने में सहायक माना जाता है।
कुछ धार्मिक परंपराओं में पितृपक्ष के दौरान नियमित रूप से दत्तात्रेय नामजप करने की सलाह दी जाती है। 72 माला नामजप का उल्लेख भी एक विशेष साधना के रूप में मिलता है। हालांकि, नामजप की संख्या और विधि अलग-अलग संप्रदायों तथा साधना परंपराओं में अलग हो सकती है।
पितृपक्ष में क्या करना चाहिए
पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों का स्मरण करना, उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करना, तर्पण एवं पिंडदान करना और अपनी क्षमता के अनुसार दान करना धार्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। कई परिवार इस दौरान सात्विक भोजन और धार्मिक अनुशासन का पालन भी करते हैं।
पितृपक्ष का मूल भाव पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण से जुड़ा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्धकर्म से पितरों की शांति और परिवार के कल्याण की कामना की जाती है। यही कारण है कि हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति कर्तव्य निभाने की महत्वपूर्ण अवधि माना गया है।

