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Vishwakarma Puja 2026 : आज विश्वकर्मा पूजा, सुख-समृद्धि और कारोबार में उन्नति के लिए ऐसे करें भगवान विश्वकर्मा की पूजा, जानें शुभ मुहूर्त और विधि

by Rakesh Pandey
Vishwakarma Puja 2026
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फीचर डेस्क : भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पकार और वास्तुकार माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष कन्या संक्रांति के अवसर पर विश्वकर्मा पूजा की जाती है। वर्ष 2026 में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर, गुरुवार को मनाई जा रही है। यह पर्व विशेष रूप से कारखानों, कार्यशालाओं, निर्माण से जुड़े प्रतिष्ठानों, उद्योगों और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन मशीनों, औजारों और कार्यस्थल की पूजा करने की परंपरा है। पंचांग के अनुसार, 17 सितंबर को कन्या संक्रांति भी है और इसी अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।

मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा ने देवताओं के लिए अनेक दिव्य भवनों और संरचनाओं का निर्माण किया था। इसी कारण उन्हें निर्माण कला, वास्तुकला, शिल्प और तकनीकी कौशल से जोड़ा जाता है। विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर कारोबारी प्रतिष्ठानों और औद्योगिक संस्थानों में मशीनों और उपकरणों को साफ करके उनकी विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन काम में सफलता, कार्यस्थल की सुरक्षा और कारोबार में उन्नति की कामना से भगवान विश्वकर्मा का पूजन किया जाता है।

विश्वकर्मा पूजा 2026 कब है?

विश्वकर्मा पूजा 2026 में 17 सितंबर, गुरुवार को मनाई जा रही है। पंचांग के अनुसार इसी दिन कन्या संक्रांति है। सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश करने के समय को इस पर्व से जोड़ा जाता है।

विश्वकर्मा पूजा मुख्य रूप से उन लोगों के लिए विशेष मानी जाती है जो निर्माण, मशीनरी, कारीगरी, वास्तु, तकनीकी कार्य, उद्योग और विभिन्न प्रकार के उपकरणों से जुड़े हैं। कई जगहों पर इस दिन कारखानों और कार्यस्थलों में भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित कर सामूहिक पूजा भी की जाती है।

विश्वकर्मा पूजा 2026 का शुभ मुहूर्त

उपलब्ध पूजा मुहूर्त के अनुसार 17 सितंबर को भगवान विश्वकर्मा की पूजा के लिए दिन में कई शुभ समय बताए गए हैं। सुबह 7:58 बजे से 10:43 बजे तक, दोपहर में 12:15 बजे से 1:48 बजे तक और शाम में 4:52 बजे से 6:24 बजे तक पूजा की जा सकती है।

हालांकि पूजा के समय में स्थान के अनुसार थोड़ा अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय पंचांग के अनुसार समय का मिलान करना उचित माना जाता है। पंचांग में 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा और कन्या संक्रांति दोनों का उल्लेख है।

विश्वकर्मा पूजा की सरल विधि

विश्वकर्मा पूजा से पहले कार्यस्थल, दुकान, कारखाने, कार्यालय और मशीनों की अच्छी तरह सफाई करें। पूजा में इस्तेमाल होने वाले औजारों और उपकरणों को भी साफ कर लें। इसके बाद पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें और वहां चौकी स्थापित करें।

चौकी पर पीले रंग का कपड़ा बिछाकर लाल कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। इसके बाद सबसे पहले भगवान गणेश का पूजन करें। गणेश पूजा के बाद भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा या तस्वीर को पूजा स्थल पर स्थापित करें।

भगवान विश्वकर्मा को रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, फल और मिठाई अर्पित करें। इसके बाद कार्यस्थल पर इस्तेमाल होने वाले औजारों, मशीनों और उपकरणों पर तिलक लगाएं। उन पर अक्षत और फूल चढ़ाकर भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करें।

पूजा के दौरान भगवान विश्वकर्मा के मंत्र का जाप करें। इसके बाद धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करके आरती करें। पूजा समाप्त होने के बाद उपस्थित लोगों में प्रसाद बांटें और भगवान से पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।

विश्वकर्मा पूजा में कौन सा मंत्र पढ़ें?

भगवान विश्वकर्मा की पूजा के दौरान “ॐ विश्वकर्मणे नमः” मंत्र का जाप किया जा सकता है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार इस मंत्र का जाप करते हुए भगवान विश्वकर्मा का ध्यान कर सकते हैं।

मंत्र जाप के बाद भगवान को पुष्प अर्पित करें और कार्यस्थल, मशीनों तथा कारोबार में सुख-समृद्धि और उन्नति की प्रार्थना करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को शिल्प और निर्माण कला का अधिष्ठाता माना जाता है।

विश्वकर्मा पूजा में मशीनों और औजारों की पूजा क्यों होती है

विश्वकर्मा पूजा में मशीनों, औजारों और तकनीकी उपकरणों की पूजा की विशेष परंपरा है। कारखानों और कार्यशालाओं में इस दिन मशीनों की सफाई की जाती है और उन्हें फूल, अक्षत तथा रोली अर्पित की जाती है।

इस परंपरा का संबंध भगवान विश्वकर्मा को शिल्प, निर्माण और तकनीकी कौशल के देवता के रूप में मानने से है। उद्योगों और कारीगर समुदायों में यह पर्व विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।

विश्वकर्मा पूजा की कथा

पौराणिक मान्यताओं में भगवान विश्वकर्मा को दिव्य शिल्पकार और वास्तुकार बताया गया है। मान्यता है कि उन्होंने देवताओं के लिए अनेक भव्य भवनों और दिव्य संरचनाओं का निर्माण किया। इसी कारण उन्हें निर्माण कला और वास्तु का देवता माना जाता है।

धार्मिक परंपराओं में भगवान विश्वकर्मा का संबंध विभिन्न दिव्य अस्त्रों, भवनों और नगरों के निर्माण से भी जोड़ा जाता है। उनकी पूजा करने की परंपरा विशेष रूप से शिल्पकारों, कारीगरों, इंजीनियरों, वास्तु से जुड़े लोगों और औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों के बीच प्रचलित है।

विश्वकर्मा पूजा की आरती और भजन

पूजा के अंत में भगवान विश्वकर्मा की आरती की जाती है। आरती के दौरान दीप जलाकर भगवान का स्मरण करें और परिवार, कार्यस्थल या प्रतिष्ठान की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा से काम में सफलता, कार्यस्थल पर सुरक्षा और कारोबार में निरंतर प्रगति की कामना की जाती है।

विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर भगवान विश्वकर्मा के पारंपरिक भजन और स्तुति का पाठ भी किया जाता है। धार्मिक आयोजन के अनुसार सामूहिक रूप से भजन-कीर्तन किया जा सकता है।

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