
रांची: झारखंड के गोड्डा जिले का शांत सा गांव घाट बलिया। यहां का निवासी पवन कुमार तुरी इलाके में एक बड़ा समाजसेवी माना जाता था। कभी गरीबों को मुफ्त पत्तल बांटना, कभी मानवाधिकार की दुहाई देना, तो कभी गाड़ियों पर ‘प्रेस’ का बोर्ड लगाकर घूमना। सोशल मीडिया पर वह खुद को बड़ा यू-ट्यूबर और आरटीआई एक्टिविस्ट बताता था। लेकिन इस सफेदपोश चेहरे के पीछे छुपा था एक ऐसा सच, जिसने पुलिस महकमे के होश उड़ा दिए।
समाजसेवा और मानवाधिकार की आड़ में पवन असल में मौत का सामान बना रहा था। बिहार एसटीएफ और स्थानीय पुलिस ने जब मिलकर उसके घर पर धावा बोला, तो झारखंड और बिहार के अब तक की सबसे बड़ी मिनी गन फैक्ट्री का भंडाफोड़ हुआ।
तेज संगीत में दबती रही गोलियों की गूंज: हर महीने सप्लाई होते थे 300 हथियार
पुलिस को कार्रवाई के लिए जेसीबी बुलानी पड़ी। पवन के घर के गुप्त कमरों को जब ढहाया गया, तो अंदर का नजारा देखकर अधिकारी दंग रह गए। लेथ मशीनें, ड्रिल मशीनें, लोडेड राइफल, पिस्टल, स्प्रिंग और कट्टा बनाने का भारी-भरकम सामान मिला। इतना सामान था कि उसे ले जाने के लिए पुलिस को ट्रैक्टर और पिकअप वैन बुलानी पड़ी।
जांच में सामने आया कि यह काला कारोबार पिछले 4-5 सालों से बेधड़क चल रहा था। मशीनों के शोर को छिपाने के लिए पवन घर में दिन-रात तेज आवाज में फिल्मी गाने बजाता था। गांव वाले समझते रहे कि अंदर पत्तल बनाने की मशीन चल रही है। रोजाना 8 से 10 मजदूर यहां काम करते थे और हर महीने करीब 300 अवैध हथियार बनकर तैयार होते थे।
यहां से बने तमंचे बिहार के पटना, मुंगेर, भागलपुर और बेगूसराय तक सप्लाई किए जाते थे। पवन ने इस अवैध धंधे से करोड़ों की कमाई की। छापेमारी से ठीक पहले पवन अपनी गाड़ी में कुछ हथियार लादकर फरार हो गया, जबकि पुलिस उसकी पत्नी और परिजनों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है। अब सवाल यह भी उठ रहा है कि तीन-तीन थानों की नाक के नीचे इतने सालों से मौत के सामान की यह फैक्ट्री चल रही थी और स्थानीय खाकी को इसकी भनक तक कैसे नहीं लगी?

