Jharkhand Bureaucracy : गुरु मौज में थे। सामने अखबार पड़ा था और हाथ में मोबाइल। चेहरे के भाव ऐसे कि कुछ मनचाहा हो गया हो। रंग में भंग का इरादा बिल्कुल नहीं था। लिहाजा, चुपचाप सामने बैठ गया। अखबार हाथ में उठाया तो नजर पन्ने पर टिक गई। मोटी-मोटी हेडलाइन छपी थी। ‘इतने अधिकारी वेटिंग फॉर पोस्टिंग’। लगा इसमें क्या नया है? वेटिंग तो सिस्टम का ‘मेरुदंड’ है। पहले साहब खुद रहते हैं। फिर जनमानस को रखते हैं। अगर कहीं से आवाज आई तो सीधा सा जवाब…। सब कुछ प्रकिया के तहत हो रहा है…। इतने में मोबाइल पर चल रही रील से बच्ची की आवाज गूंजी, ‘टेम लगेगा टेम…’। कानों में शब्द पड़ते ही एक साथ दोनों हंस पड़े।
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यह ध्वनि प्रसंग से जुड़ी महसूस हुई, मानो किसी ने अधूरा वाक्य पूरा कर दिया। गुरु माजरा समझ गए। इसके बावजूद औपचारिक बातचीत का सिलसिला हालचाल से शुरू किया। फिर पूछा- ‘और बताओ क्या हाल हैं नौकरशाही के’। उत्तर दिया- वही तो देख रहा था गुरु। अखबार बता रहा है, सब लटके हुए हैं।
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आईएएस, आईएफएस से लेकर डिप्टी कलेक्टर तक। कोई बोलने वाला नहीं। कोई देखने वाला नहीं। गुरु बोले- तुम्हारे आने से पहले ‘एक्स’ पर एक पोस्ट देख रहा था। ‘एक पत्र, हजार सपने’ टाइप। हां- हां गुरु नजर पड़ी थी। दरअसल गुरु जहां इशारा कर रहे थे, बात वहां तक जा रही थी। बस समझ नहीं आ रही थी। भावार्थ क्या था? निहितार्थ क्या था? सो, साफ-साफ कह डाला- पूरी बात समझा नहीं। सोशल मीडिया पोस्ट से वेटिंग लिस्ट का क्या लेना-देना? गुरु बोले- बात मगज तक पहुंचाने के लिए एक कहानी सुनाता हूं- एक आदमी राजा के बाल काटता था। बाल काटते समय राजा अक्सर उससे राज्य का हालचाल पूछ लेता। वह बताता- जनता बड़ी सुखी है।
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सब चांदी की कटोरी में दूध-रोटी खा रहे। बार-बार एक ही बात सुनकर राजा को शक हुआ। हकीकत जानने खुद वेश बदल कर निकल गया। राज्य में जगह-जगह घूमने पर पता चला, जनता बड़ी परेशान है। व्यवस्था बेलगाम है। राजा चुपचाप संबंधित व्यक्ति के घर पहुंच गया। देखा- वह बरामदे में बैठा चांदी की कटोरी में दूध-रोटी खा रहा था। राजा को बात समझ में आ गई। गुरु ने पूछा- कहानी से क्या सीखे? यही कि नौकरशाही की आधी समस्या के जिम्मेदार ऐसे कुछ लोग हैं। ये राजा की कृपा से खुद दूध-रोटी चाप रहे हैं। पूछने पर बता रहे, सब इसी हाल में हैं। ये राजा के इर्द-गिर्द रहकर X प्रेम का गुणा-गणित समझ गए हैं।
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लिहाजा, प्रशस्ति गान का कोई मौका नहीं छोड़ते। ये राजा की चापलूसी के उस धरातल पर उतर जाते हैं, जहां दूसरों का ठहरना मुश्किल है। राजा को बस एक ही तस्वीर दिखाई जाती है- सब चंगा सी। यही वजह है कि साल-दर-साल बीत रहे। इनके चांदी के कटोरे में दूध-रोटी बना हुआ है। नए आए नौकरशाह महीनों इंतजार करें, इनकी बला से। कोई दो जिले तक नहीं पहुंच पाए, उनकी किस्मत।
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किसी ने महीनों से ऑफिस का मुंह नहीं देखा। कोई बात नहीं। सरकारी राजस्व के करोड़ों बेकार हो रहे। कोई फर्क नहीं। बस इनके जीवन की चकाचौंध कम नहीं हुई। आखिर राजा को ‘पापा’ से ज्यादा सम्मान जो देते हैं। अब बात पूरी हो गई थी। गुरु उठे तो विदा लिया, फिर हम अपने रास्ते, वह अपने…।
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