Ranchi: झारखंड की सियासत में एक बड़ा संकेत सामने आ रहा है। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने हाल के दिनों में अपनी राजनीतिक रणनीति में बदलाव के संकेत दिए हैं। असम के बाद अब बंगाल में भी पार्टी ने कांग्रेस से दूरी बनाते हुए स्वतंत्र रुख अपनाया है, जिससे विपक्षी गठबंधन की अंदरूनी राजनीति पर सवाल खड़े हो गए हैं।राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एकजुट दिखने वाले दल अब राज्यों में अलग-अलग रणनीतियां अपनाते नजर आ रहे हैं। झामुमो का यह कदम इसी बदलते समीकरण की ओर इशारा करता है।
बंगाल में कांग्रेस से दूरी, TMC के प्रति नरम रुख
पश्चिम बंगाल में झामुमो ने कांग्रेस के साथ जाने के बजाय तृणमूल कांग्रेस के प्रति नरम रुख दिखाया। यह फैसला बताता है कि पार्टी अब केवल राष्ट्रीय गठबंधन की मजबूरियों के आधार पर नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों और अपने संगठनात्मक हितों को प्राथमिकता दे रही है।इससे पहले असम में भी सीट बंटवारे और राजनीतिक सम्मान को लेकर कांग्रेस और झामुमो के बीच मतभेद सामने आए थे, जिसने दोनों दलों के रिश्तों में खटास पैदा की।
क्षेत्रीय दल की छवि से बाहर निकलने की कोशिश
झामुमो अब खुद को सिर्फ झारखंड तक सीमित क्षेत्रीय दल के रूप में नहीं देखना चाहता। पार्टी नेतृत्व पूर्वी भारत में अपने विस्तार, आदिवासी राजनीति में पकड़ और सामाजिक आधार को मजबूत कर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाना चाहता है। इसी रणनीति के तहत झामुमो कांग्रेस के साथ रिश्तों में संतुलन बनाए रखना चाहता है, ताकि गठबंधन भी बना रहे और उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान भी मजबूत हो।
झारखंड में क्या बदलेंगे समीकरण?
झारखंड में फिलहाल झामुमो और कांग्रेस सत्ता में साझेदार हैं और दोनों मिलकर भाजपा के खिलाफ खड़े हैं। लेकिन अगर झामुमो का यह स्वतंत्र रुख आगे भी जारी रहता है, तो आने वाले समय में राज्य की राजनीति में नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह रणनीति झामुमो को दीर्घकाल में मजबूत कर सकती है, लेकिन गठबंधन राजनीति में नई चुनौतियां भी पैदा कर सकती है।

