Jamshedpur : घाटशिला विधानसभा चुनाव में बेटे बाबूलाल सोरेन की हार के बाद अब पूर्व सीएम चंपई सोरेन ने अपनी बेटी दुखनी सोरेन को सियासत में उतार दिया है। माना जा रहा है कि दुखनी सोरेन को आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा पोटका विधानसभा से टिकट देगी। पोटका में दुखनी सोरेन जेएमएम के संजीव सरदार का सामना कर सकती हैं। इसके लिए दुखनी सोरेन ने अभी से मेहनत शुरू कर दी है। मंगलवार को दुखनी सोरेन पोटका के लोगों को लेकर उनकी समस्या के हल के लिए जमशेदपुर पहुंचीं और डीसी ऑफिस के गेट के बाद अपनी कार के बौनट पर खड़ी होकर नए अंदाज में लोगों को संबोधित किया।
पोटका में पूर्व सीएम चंपई सोरेन का तगड़ा नेटवर्क है। उनके बेटे बाबूलाल सोरेन ने पहले पोटका को ही अपना संघर्ष क्षेत्र बनाया था। यहां कई साल काम किया था। बाद में उन्होंने फैसला बदला और घाटशिला इलाके में काम करना शुरू कर दिया। मगर, वह विधानसभा चुनावों में जीत हासिल नहीं कर पाए। घाटशिला में जेएमएम के रामदास सोरेन और फिर उपचुनाव में उनके बेटे सोमेश सोरेन ने बाबूलाल सोरेन को पटखनी दे दी। साल 2024 के विधानसभा चुनाव में जेएमएम के स्वर्गीय रामदास सोरेन ने बाबूलाल सोरेन को 22 हजार 446 मतों से हराया था। रामदास सोरेन के निधन के बाद साल 2025 में यहां चुनाव हुआ। इस चुनाव में रामदास के बेटे सोमेश सोरेन ने बाबूलाल सोरेन को 38 हजार 61 मतों से हराया था।
बाबूलाल की नाकामी के बाद अब पूर्व सीएम को लग रहा है कि उनकी बेटी दुखनी सोरेन उनके सियासी विरासत को संभाल सकती है। इसके बाद अब दुखनी सोरेन पोटका में पूरी तरह सक्रिय हो चुकी हैं।
विकास कायों में माझी बाबा व ग्राम प्रधानों की अनदेखी का आरोप
दुखनी सोरेन ने आदिवासी जनता की समस्या उठानी शुरू की है। मंगलवार को उनके नेतृत्व में पोटका के लोग जुलूस की सूरत में साकची पहुंचे। यहां लोगों को संबोधित करते हुए दुखनी सोरेन ने कहा कि पोटका में जो विकास कार्य हो रहे हैं उनमें इलाके के माझी बाबा और ग्राम प्रधानों की अनदेखी की जा रही है। जो भी विकास कार्य हो रहे हैं उनमें आदिवासी समाज और परंपरा की अनदेखी हो रही है। यह ठीक नहीं है। उनका कहना है कि इलाके में जो भी विकास कार्य हो रहे हैं उनमें स्थानीय लोगों की भूमिका तय करना जरूरी है। विकास कार्यों में स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होने से जनता में असंतोष बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि विकास कार्यों में माझी बाबा और पारंपरिक ग्राम प्रधानों की भागीदारी होनी जरूरी है।
उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर 15 दिनों में उनकी मांग नहीं मानी गईं तो पोटका में ग्राम सभा और महापंचायत का आयोजन होगा और इस पंचायत में समाज से जुड़ी समस्याओं पर मंथन किया जाएगा। साथ ही आगे के आंदोलन की रणनीति तय की जाएगी।

