चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा सदर प्रखंड अंतर्गत बड़ा लागिया गांव में रजो पर्व के अवसर पर छऊ नृत्य का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीण और कला प्रेमी उपस्थित रहे। छऊ कलाकारों की पारंपरिक वेशभूषा और आकर्षक प्रस्तुतियों ने रात भर दर्शकों को बांधे रखा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में परिवहन मंत्री दीपक बिरुवा व विशिष्ट अतिथि के रूप में झामुमो नेत्री मोनिका बोयपाई, झामुमो प्रखंड अध्यक्ष सतीश सुंडी, सोबोन, बसंती सुंडी, सोमवारी नाग उपस्थित थे।
पौराणिक कथाओं पर आधारित मुखौटा प्रस्तुतियों के लिए है विश्व प्रसिद्ध
मौके पर मंत्री दीपक बिरुवा ने कहा कि छऊ पूर्वी भारत का एक जीवंत अर्ध-शास्त्रीय नृत्य है जो अपनी मार्शल आर्ट और पौराणिक कथाओं पर आधारित मुखौटा प्रस्तुतियों के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यह आयोजन पारंपरिक सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत रखने और स्थानीय लोक कलाओं को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि छऊ नृत्य कोई साधारण कला नहीं है, बल्कि यह पूर्वी भारत की मिट्टी, उसकी वीरता और परंपराओं की एक सजीव कहानी है। यह नृत्य मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के क्षेत्रों में सदियों से किया जा रहा है।
छऊ ने युद्ध की कला को संगीत व लय से जोड़ा
यह नृत्य इस बात का सबसे बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे युद्ध की कला (मार्शल आर्ट) को संगीत और लय के साथ जोड़कर एक उत्कृष्ट कला में बदला जा सकता है। छऊ नृत्य की सबसे खास बात इसके रंग-बिरंगे और बड़े मुखौटे हैं नर्तक बिना एक भी शब्द बोले, सिर्फ अपने शरीर के शारीरिक हाव-भाव और कलाबाजियों के माध्यम से रामायण, महाभारत और स्थानीय लोककथाओं के प्रसंगों को जीवंत कर देते हैं। आज के आधुनिक युग में जब हमारी पारंपरिक कलाएं विलुप्त होती जा रही हैं, छऊ नृत्य का संरक्षण हमारा परम कर्तव्य है। यह नृत्य न केवल हमारी पहचान है, बल्कि हमारे देश की एकता और भाईचारे का भी प्रतीक है।
अपनी परंपरा को लोक कला से जोड़ते हैं ऐसे आयोजन : मंत्री
मंत्री दीपक बिरुआ ने कहा कि छऊ नृत्य झारखंड की गौरवशाली सांस्कृतिक पहचान है। ऐसे आयोजन समाज को अपनी परंपरा, संस्कृति और लोक कला से जोड़ने का कार्य करते हैं। छऊ नृत्य आयोजन समिति अध्यक्ष प्रमोद नायक ने मंत्री जी की सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय भागीदारी की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से क्षेत्र की लोक कला व परंपराओं को नई पहचान मिल रही है। कार्यक्रम को सफल बनाने में आयोजन समिति के प्राण सुंडी, जयप्रकाश सुंडी, सिंगराय हसदा, कामेश, सावित्री सुंडी समेत अन्य का योगदान सराहनीय रहा।

