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Old Hindi Film Stories : बेहतरीन मर्डर मिस्ट्री-अपराधी कौन

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे काॅलम : 'गुमनाम है कोई' से साभार

by Vaibhav Mani Tripathi
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साल 1948 में बांग्ला साहित्यकार और फिल्मकार प्रेमेन्द्र मित्र द्वारा लिखित और निर्देशित फिल्म आई ‘कालो छाया’। फिल्म सफल हुई पर उस दौर में जब सिनेमा को सामाजिक संदेश देने का साधन माना जाता था, इस फिल्म की आलोचना इस कारण हुई कि फिल्म की कहानी में कोई सामाजिक संदेश नहीं है। फिल्म की रिलीज के लगभग एक दशक बाद, मशहूर फिल्मकार विमल रॉय ने इसी कहानी को हिन्दी में बनाने की सोची और फिल्म के निर्देशन का जिम्मा सौंपा अपने सहायक असित सेन को। कालो छाया की कहानी की हिन्दी पटकथा तैयार की रघुनाथ झालनी ने और फिल्म में माला सिन्हा के साथ आए अभि भट्टाचार्य जो बिराज बहु और जागृति जैसी फिल्मों से अपनी पहचान बांग्ला और हिन्दी सिनेमा में लगभग एक साथ बना चुके थे।

फिल्म शुरू होती है जब एक बूढ़ा अपाहिज आदमी अपने अमीर, जमींदार भाई के पास गरीबी की हालत में पहुंचता है। पता चलता है कि गरीब भाई दीनानाथ (गजानन जागीरदार) को यह जानकारी मिली कि अपने पिता की जिस जायजाद को वो अपनी जवानी में ठुकरा चुका था, अब उस जायजाद को उसका हमशक्ल भाई श्रीनाथ (गजानन जागीरदार) भोग रहा था, उस जायजाद को उसके पिता ने दीनानाथ और एक तीसरे भाई पीताम्बर के बीच बराबर-बराबर बाँट दिया था। पीताम्बर का कोई पता नहीं क्योंकि उसने अपनी मर्जी से शादी की थी और घर छोड़ कर चल गया था। पिता की नई वसीयत हासिल कर उसे नष्ट करने के इरादे से श्रीनाथ राय बहादुर जानकीनाथ (मुराद) से बात करता है, पर बार डान्सर लिली (लिलियन एजरा) की मध्यस्थता से कारवाई गई ये मुलाकात असफल हो जाती है क्योंकि उस वसीयत के बदले राय बहादुर, श्रीनाथ से एक बाड़ी रकम की आशा रखता है।

वसीयत पाने के लिए जब श्रीनाथ राय बहादुर के घर में लिली की मदद से चोरी करने जाता है तो वहाँ राय बहादुर के जाग जाने की वजह से असफल हो जाता है और उन दोनों के बीच हुई हाथापाई में श्रीनाथ के हाथों चली गोली से राय बहादुर की मौत हो जाती है। श्रीनाथ वहाँ से भाग जाता है और अपनी जान पर खतरे का हवाला दे कर जासूस राजेश नाथ को बुला भेजता है। राजेश नाथ(अभि भट्टाचार्य), जो एक नामी जासूस हैं और पुलिस की मदद करते रहते हैं, उन्हें मिलने आती है एक लड़की जो उन्हें एक वसीयत चुराने के काम पर लगाना चाहती है। राजेश उसे समझा कर वापस भेजते हैं तभी उन्हें श्रीनाथ का संदेश मिलता है और वो अपने सहायक के साथ जमींदार श्रीनाथ की हवेली पर जीतपुर आ पहुंचते हैं । यहाँ श्रीनाथ से उनकी मुलाकात होती है पर वो राजेश को यह नहीं बता पाता कि उसे किससे और क्यों खतरा है।

राजेश को यह बात थोड़ी अजीब लगती है, उसे श्रीनाथ की जेब से गिरा रुमाल मिलता है जिस पर एक होटल का चिह्न और उस होटल के कमरे का नंबर लिखा हुआ है। इसी घर में उसे वो लड़की मिलती है जो राजेश से चोरी करवाना चाहती थी, वो लड़की श्रीनाथ बाबू की नर्स थी। नर्स शोभा (माला सिन्हा) से बातचीत के बाद राजेश अपने कमरे में सोने चला जाता है। इधर श्रीनाथ के डॉक्टर (तरुण बोस) और श्रीनाथ में एक नई ईजाद की गई दवा के फार्मूला की चोरी और पेटेंट में हिस्सेदारी को लेकर हुए आपसी विवाद के बाद श्रीनाथ भी सोने चल जाता है। रात को जब राय बहादुर के कत्ल के इल्जाम में पुलिस श्रीनाथ को पकड़ने के लिए आती है तो उसे पता चलता है कि श्रीनाथ का कत्ल हो चुका है।

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श्रीनाथ के कत्ल का शक डॉक्टर, शोभा से लेकर वहाँ मौजूद सभी लोगों पर होने की वजह से पुलिस इन्स्पेक्टर वर्मा (पॉल महेंद्र) सभी को उसी हवेली में रहने के लिए कहते हैं जब तक कातिल पकड़ा नहीं जाता और जासूस राजेश से खूनी को पकड़ने के लिए मदद की गुजारिश भी करते हैं। इंस्पेक्टर के जाने के बाद नर्स शोभा सबसे पहले श्रीनाथ के कमरे में घुसने की कोशिश करती है और राजेश उसे पकड़ लेता है। पता चलता है कि शोभा वही वसीयत चुरा रही थी जिसकी चोरी वो राजेश से करवाना चाहती थी। ये वही वसीयत थी जो राय बहादुर जानकी नाथ का कत्ल कर के श्रीनाथ ने हासिल की थी।

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शोभा बताती है कि श्रीनाथ के भड़काने के कारण ही जोगेश्वर बाबू ने अपने दो बेटों दीनानाथ और पीताम्बर को जायजाद से बेदखल किया था, बाद में भूल पता चलने पर पूरी जायजाद उन्हीं दोनों के नाम कर दी। अभी शोभा यह कहानी सुना ही रही थी कि एक काला साया खिड़की पर आता है और जब राजेश उसे पकड़ने को उसके पीछे भागता है तो हवेली में आ कर एक बिन्दु पर साया गायब हो जाता है। फिल्म जैसे आगे बढ़ती है तो कभी डॉक्टर पर शक होता है, कभी शोभा पर, कभी गूंगे-बहरे नौकर तो कभी लिली भी शक के घेरे मे आ जाती है। राजेश, श्रीनाथ की जेब से गिरे रुमाल के कारण सुराग तक पहुँच जाता है। थोड़ी बहुत माथापच्ची, कुछ एक गीत और थोड़ी बहुत हाथापाई के बाद अंततः, खूनी पकड़ लिया जाता है और काले साये के रहस्य से पर्दा उठ जाता है।

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अगर सन 1950 के दशक को आधार मान कर बात करें तो, अपराधी कौन, एक बढ़िया थ्रिलर और मर्डर मिस्ट्री थी। फिल्म की शुरुआत से लेकर एक लंबे हिस्से तक मतलब लगभग क्लाइमैक्स के पहले तक, निर्देशक और लेखक रहस्य छुपाने में कामयाब रह जाते हैं। व्रजेन्द्र गौड़ के संवाद खासे प्रभावी है और फिल्म में कुछ भी अनावश्यक बोला गया नहीं लगता। अभि भट्टाचार्य, माला सिन्हा और गजानन जागीरदार की मुख्य भूमिकाओं के अलावा, राजेश नाथ के सहायक के रूप में कुमुद त्रिपाठी, चम्पा के रूप में कम्मो, इन्स्पेक्टर के रूप में पॉल महेंद्र, गूंगे-बहरे नौकर के रूप में धूमल, डाक्टर के रूप में तरुण बोस और लिली के रूप में लिलियाँ एजरा ने बेहतरीन अभिनय किया । लिलियन और तरुण बोस की यह पहली फिल्म थी । फिल्म का निर्देशन असित सेन ने किया था।

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व्यक्तिगत जीवन में काम के प्रति काफी गंभीर रहने वाले और मितभाषी असित सेन को भारतीय और खासकर हिन्दी पट्टी के दर्शकों द्वारा एक हास्य-अभिनेता के रूप में ही पहचाना जाता है और इन्होंने अपने जीवन में दो फिल्मों के निर्देशन के अलावा कई फिल्मों में बेहतरीन हास्य एवं चरित्र भूमिकाएं कीं।

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कई बार नाम का साम्य होने के करण असमी भाषा की फिल्म से अपना निर्देशन करिअर शुरू करने वाले और बंगाली फिल्म उत्तरा फाल्गुनी के निर्देशन के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किये जाने वाले असित सेन (जिन्होनें ममता, खामोशी, सफर और बैराग जैसी फिल्में निर्देशित कीं) और अपराधी कौन के निर्देशक असित सेन को एक ही व्यक्ति समझ लिया जाता है। पर हम पाठकों को बताना चाहेंगे कि सफर के निर्देशक असित सेन और अभिनेता तथा अपराधी कौन के निर्देशक असित सेन दोनों अलग अलग व्यक्ति हैं। फिल्म में श्रीनाथ और दीनानाथ की दोहरी भूमिकाएं निभाने वाले गजानन जागीरदार ने खुद अनेकों फिल्मों का निर्देशन किया और पुणे के प्रतिष्ठित फिल्म और टेलिविज़न इंस्टिट्यूट (FTII) के पहले निदेशक (प्रधानाचार्य) बने।

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1957 में थियेटर में प्रदर्शित अपराधी कौन, एक औसत से बेहतर प्रदर्शन वाली फिल्म थी। दर्शकों को उस वर्ष नया दौर, मदर इण्डिया, प्यासा, दो आँखें बारह हाथ जैसी फिल्में देखने को मिलीं, पर माला सिन्हा और अभि भट्टाचार्य के अभिनय और टाइमिंग की सब जगह तारीफ हुई। फिल्म में कुछ एक कमियाँ भी थीं, दास ढिमादे का सम्पादन इस फिल्म में कई जगह कमजोर दिखाई देता है। कहानी कुछ इस तरह आगे बढ़ती है कि कुछ एक टूटी कड़ियाँ दर्शकों को खुद जोड़नी पड़ती हैं, कुछ ऐसे दृश्यों या घटनाओं का फिल्म का हिस्सा बन जाना जिन्हें छोड़ा जा सकता था और कई दृश्यों का बस फिल्म में रह जाना फिल्म की कसावट को कमजोर करता है।

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फिल्म की एक बड़ी कमजोरी है फिल्म का संगीत। सलिल चौधरी का संगीत, मजरूह सुल्तानपुरी के गीत और आशा भोंसले और मन्ना डे की आवाज होने के बाद भी, एक भी ऐसा गीत नहीं जो दर्शक को फिल्म समाप्त होने के बाद भी याद रह जाए। पर कुल मिला कर समग्रता में देखें तो एक बढ़िया कहानी पर बनी फिल्म अपराधी कौन, एक बढ़िया मर्डर मिस्ट्री है और उन्नीस सौ पचास के दशक में डबल रोल की संकल्पना को परदे पर उतारने के लिए हिन्दी पट्टी में याद रखी जाने लायक फिल्म है। फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है और कहना ना होगा कि भले साल 1957 का हो, फिल्म का प्रिन्ट काफी बेहतरीन है और पुरानी फिल्मों को देखने में आने वाली समस्याएं इस फिल्म को देखते हुए नहीं आती है।

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