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Old Hindi Film Stories :  न्यायिक सुधारों को रेखांकित करती लाल बंगला

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे काॅलम : 'गुमनाम है कोई' से साभार

by Vaibhav Mani Tripathi
Old Hindi Film Stories
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फिल्म की शुरुआत एक व्यक्ति मंगू (शेख मुख्तार) के तीन साल बाद जेल से छूटने से होती है । कहानी आगे बढ़ने पर हम जानते हैं कि मंगू के जेल जाने के बाद उसकी बीवी मर चुकी है और उसकी बच्ची अनाथों की तरह पल रही है । मंगू अपनी बच्ची को लेकर सीधे उसे गिरफ्तार करवाने वाले सेठ (राजन हक्सर) के पास पहुंँचता है, जहां पता चलता है कि अपने गुनाह छिपाने के लिए सेठ जी ने मंगू को चोरी के झूठे आरोप में फंसा कर जेल भिजवाया था। सेठ जब उसे उसकी पुरानी नौकरी वापस देने से इनकार कर देता है तो मंगू उसे गिरफ्तार करने वाले इन्स्पेक्टर कपूर (पृथ्वी राज कपूर) के पास पहुंचता है और उन्हें विश्वास दिलाने का प्रयास करता है कि उसे गलत आरोपित किया गया है। पर इन्स्पेक्टर कपूर जो अब एस पी बन चुके हैं, उनसे मंगू को कोई हमदर्दी नहीं मिलती है और निराश मंगू वहाँ से निकल कर जुर्म और अपराध की दुनिया में चला जाता है । सालों बाद मंगू अब दुनिया की नज़रों में एक इज्जतदार सेठ दीनदयाल बन चुका है पर मूलतः वो एक सफेदपोश अपराधी है ।


एसपी साहब के दोनों बेटे अब बड़े हो चुके हैं, बड़ा बेटा शंकर (जुगल किशोर) सीआईडी ऑफिसर बन चुका है और छोटा बेटा राजा (सुजीत कुमार) क्या करता है यह पता नहीं पर पहाड़ों में गाने गाता दिखाई दे रहा है । इधर मंगू उर्फ सेठ दीनदयाल की बेटी मालती (जयन्ती) भी बड़ी हो गई है और उसकी दोस्ती राजा से हो चुकी है । सीआईडी बने शंकर को शहर के जिस गैंग की तलाश है उससे जुड़ी एक फाइल चुराने के लिए मंगू मदद लेता है बेला (श्यामा) की । पर वो असफल रहती है। इसी बीच मालती और राजा की दोस्ती और प्यार की खबर सेठ दीनदयाल को मिलती है और वो अपने गैंग की बेला को ये जिम्मा देता है कि बेला राजा से इस तरह मेल जोल बढ़ा ले कि राजा, मालती को भूल जाए। बेला को यहाँ भी असफलता मिलती है। इधर जब सेठ दीनदयाल को अवसर मिलता है तो वो दुबारा से शंकर की फाइल चुराने के लिए अपने आदमी भेजता है।

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ये आदमी भी असफल रहते हैं और शंकर इनका पीछा करता घाटी की तरफ जाने लगता है तभी शंकर को पहाड़ी पर खंडहर में एक भूतनी दिखाई देती है। इस भूतनी के चक्कर में फाइल चोर शंकर के हाथ से निकाल जाता है। शंकर जब यह बात अगले दिन अपने एसपी पिता को बताता है तो उन्हें भूत-प्रेत की कहानी पर भरोसा नहीं होता और शंकर अपने सहायक शंभू (मोहन चोटी) के साथ फिर उन्हीं खंडहरों में जाता है, यहाँ खंडहर में भूतनी फिर दिखाई देती है और इस चक्कर में असमंजस में डूबे शंकर पर मौका देख कर सेठ दीनदयाल गोली चल देता है। गोली शंकर के बाजू में लगती है और वो घायल हो जाता है। बच कर भागते दीनदयाल का पीछा करता शंकर बेहोश हो जाता है और मालती को मिल जाता है। मालती उसे घर ले कर आती है और उसका इलाज करवाती है। घर पहुँच कर दीनदयाल जब शंकर के लिए मालती को परेशान देखता है तो वो मौके का फायदा उठाते हुए एसपी साहब से राब्ता बनाने की कोशिश करता है ।

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एसपी साहब भी अपने बच्चे की जान बचाने वालों के प्रति नरमी दिखाते हैं पर सेठ दीनदयाल के रूप में मंगू को पहचान नहीं पाते। यहाँ से फिल्म की गति तेज हो जाती है और घात, प्रतिघात और चालों का एक दिलचस्प घटना क्रम देखने को मिलता है जहां सीआईडी इन्स्पेक्टर भाई अपने सगे भाई को फांसी के फंदे तक ले जाता है। अंत में सभी को उनके किए के हिसाब से कुछ ना कुछ मिल ही जाता है, धोखा देने वालों को सजा मिलती है, मुगालते में जीने वालों को समझ और नायक को मिलती है नायिका।


हिन्दी सिनेमा के लिए साल 1966 काफी यादगार साल रहा, इस साल सिनेमा घरों में मेरा साया, तीसरी मंजिल और ये रात फिर ना आएगी जैसी रहस्य रोमांच श्रेणी की फिल्में आईं और सफल रहीं, वहीं दूसरी ओर दर्शकों ने ममता, अनुपमा, देवर, सूरज और दो बदन जैसी रोमांटिक और सामाजिक फिल्मों को भी दर्शकों ने भरपूर प्यार दिया। उस बरस ने हिन्दी सिनेमा को कई कालजयी गीत दिए। या दिल की सुनो दुनिया वालों, कुछ दिल ने कहा (अनुपमा), छुपा लो यूं दिल में प्यार, रहें ना रहे हम (ममता), ले गई दिल गुड़िया जापान की (लव इन टोक्यो), बहारों फूल बरसाओ (सूरज) के अलावा तीसरी मंजिल, मेरा साया जैसी फिल्मों के गीत आज भी लोग बड़े चाव से सुनते हैं।

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शेख मुख्तार, पृथ्वी राज कपूर जैसे समर्थ अभिनेता, बेहतरीन गीत और शानदार लोकेशन्स पर शूट हुई यह फिल्म अपने समय में सफल फिल्म रही थी। फिल्म का एक गीत “चाँद को क्या मालूम” आज भी मुकेश के सबसे यादगार गीतों की हर लिस्ट में मौजूद पाया जाता है । फिल्म का निर्माण और निर्देशन, फिल्म में शंकर की भूमिका निभाने वाले जुगल किशोर ने किया था। कहानी हरि जुत्शी, पटकथा राजेश नंदा और संवाद बृज कत्याल के थे। फिल्म में कुल गीत थे, गुलशन बावरा, विनोद शर्मा और इंदीवर के लिखे इन गीतों को सुरों से सजाया था उषा खन्ना ने और इन गीतों को मुकेश, मोहम्मद रफी, आशा भोंसले और सुमन कल्याणपुर के साथ खुद उषा खन्ना ने अपनी आवाज दी थी। फिल्म में कुछ कमाल के फाइट सीक्वेंस थे जिन्हें बुरहानूद्दीन के निर्देशन में रचा गया था। लाल बँगला का बड़ा हिस्सा हिमांचल प्रदेश के कांगड़ा, धर्मशाला और पालनपुर टी एस्टेट में शूट हुआ था और फिल्म के गीतों और चेज़ सीक्वेंस में वो खूबसूरत वादियाँ हमें बहुत मनमोहक स्वरूप में दिखाई देती हैं ।

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साल 1966 में सिनेमाघरों में फिल्म प्रदर्शित फिल्म लाल बंगला को रहस्य-रोमांच श्रेणी में रखना कितना उचित है इस पर भिन्न-भिन्न लोगों कि अलग-अलग राय हो सकती है, पर मेरा मानना है कि फिल्म में थोड़ा सा रहस्य और ढेर सारा रोमांच तो जरूर है। अगर फिल्म के मुख्य स्वर की बात करें तो फिल्म का मुख्य स्वर यही है कि कानून जिसे मुजरिम करार देता है वो सबूतों और गवाहियों के आधार पर देता है और अपराधी की पहचान के इस तरीके में शातिर लोग सेंधमारी कर सकते हैं। इसलिए किसी व्यक्ति के प्रति घृणा सिर्फ इसलिए उचित नहीं कि उसे किसी बात के लिए न्यायालयों ने दंडित किया है।

हर फिल्म में शेख मुख्तार द्वारा निभाया गया चरित्र मंगू अपने मालिक द्वारा झूठे इल्जाम में सिर्फ इसलिए फंसा दिया जाता है क्योंकि उसने कभी उसके किसी गलत काम का विरोध किया था । पर फिर उसे ना अपनी नौकरी वापस मिलती ना समाज ही उसके प्रति हमदर्दी प्रदर्शित करता है। आहत मंगू ना सिर्फ बदला लेने निकाल पड़ता है बल्कि बदला सही से पूरा हो जाए इसके लिए अपराध के दलदल मे उतर जाता है । फिल्म न्यायिक सुधारों पर बल देती है और पुलिस के अपराध अनुसंधान की सीमाओं को एक भावनात्मक कहानी के माध्यम से रेखांकित करती है ।

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एक दर्शक के तौर पर फिल्म देखते समय आप देखते हैं कि जब मंगू जेल जाता है तो पृथ्वी राज कपूर इन्स्पेक्टर होते हैं और तीन साल बाद लौटने पर उन्हें एसपी के रूप में दिखाया जाता है । फिर मंगु की बेटी और एसपी साहब के बच्चे बड़े हो जाते हैं, पंद्रह- सत्रह सालों की अवधि बीत जाती है फिर भी एसपी साहब का प्रमोशन नहीं होता । इन्स्पेक्टर शंकर ट्रेन में बेला को देख कर भी जब उसे अपने घर पर देखते हैं तो पहचान नहीं पाते और आपाधापी में जांच करके इन्स्पेक्टर अपने भाई को फांसी के तख्ते तक पहुँचा देते हैं और इस कार्य में उनको एसपी साहब का पूर्ण समर्थन प्राप्त होता है, तब ऐसे में लगता है कि पुलिस विभाग ने जानबूझ कर उन्हें इन्हीं कारणों से प्रोमोशन नहीं दिया होगा।

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फिल्म का सम्पादन भी थोड़ा कमजोर है और ऐसा लछमन दास जैसे समर्थ एडिटर के होते हुए है। कहानी में जो भूतनी है उससे डरने का सारा जिम्मा मोहन चोटी को ही दिया गया लगता है क्योंकि पहले दृश्य से ही दर्शक समझ जाते हैं कि ये भूतनी वगैरह का मामला नहीं है पर रहस्य थोड़ी देर तक बना रहता है । फिल्म की इन कमियों पर ध्यान दिया गया होता तो फिल्म थोड़ी बेहतर अवश्य बन जाती ।


फिल्म को पृथ्वी राज कपूर, शेख मुख्तार, सुजीत कुमार, श्याम और मोहन चोटी के समर्थ अभिनय, उषा खन्ना के खूबसूरत संगीत, बेहतरीन गीतों और फिल्मांकन के लिए याद रखा जाता है। यूट्यूब पर फिल्म देखे जाने के लिए उपलब्ध है और अपने सामाजिक संदेश और सुंदर फिल्मांकन और भावप्रणव अभिनय के लिए अवश्य देखी जानी चाहिए ।

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