
एक निर्देशक के तौर पर विजय आनंद, जिन्हें गोल्डी आनंद भी कहा जाता है, ने कुल सोलह फिल्में निर्देशित कीं और अगर फन्टूश फिल्म के लिए निर्देशित किये गए दो गाने भी जोड़ लिये जाएं तो कह सकते हैं कि गोल्डी आनंद अर्थात विजय आनंद कुल सत्रह फिल्मों के निर्देशन से जुड़े रहे। इन सत्रह फिल्मों में से बारह फिल्मों में देव आनंद बतौर नायक फिल्म से जुड़े हुए थे। वर्ष 1966 में रिलीज हुई शम्मी कपूर अभिनीत फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ गोल्डी आनंद की पाँचवीं फिल्म थी और ऐसी पहली फिल्म थी जिसमें उनके बड़े भाई देव आनंद शामिल नहीं थे।

फिल्म की कहानी की बात करें तो, तीसरी मंजिल जाहिर तौर पर एक मर्डर मिस्ट्री है। फिल्म शुरू होती है एक गहरी काली रात से, इस गहरी काली रात में, मसूरी की वादियों में तेजी से गाड़ी चलाते हुए एक युवती ‘द पार्क होटल’ में दाखिल होती है और कुछ समय बाद होटल की तीसरी मंजिल से नीचे गिर कर दम तोड़ देती है।

ये युवती रूपा (सबीना) है। रूपा की मौत से गमज़दा उसकी बहन सुनीता (आशा पारेख) से शादी का प्रस्ताव लेकर मिलने आए हुए रूपा के मंगेतर रमेश (प्रेम चोपड़ा) के पिता को रूपा के पिता टाल देते हैं और सुनीता अपनी सहेली से मिलने के बहाने से मसूरी की यात्रा को निकल पड़ती है। नई दिल्ली स्टेशन से ही उसके पीछे अनिल (शम्मी कपूर) पड़ जाता है।
आपस में नोक-झोंक करते सुनीता और अनिल मसूरी पहुँच जाते हैं। सुनीता अपनी सहेली मीना (लक्ष्मी छाया) से बातचीत में बताती है कि मरने से पहले उसकी बहन रूपा ने उसे लिखी आखिरी चिट्ठी में बताया था कि वो ‘द पार्क होटल’ में काम करने वाले मशहूर ड्रमर रॉकी से प्रेम करती है और सुनीता को यह लगता है कि रॉकी ही उसकी बहन की हत्या का ज़िम्मेदार है। होटल का ड्रमर रॉकी कोई और नहीं अनिल ही होता है अनिल छिप कर मीना और सुनीता की बातें सुन लेता है।

सुनीता और अनिल में थोड़ी तकरार के बाद पहले दोस्ती फिर प्रेम हो जाता है और कहानी में आते हैं कुँवर साहब (प्रेम नाथ) जो अनिल अर्थात रॉकी के अंकल बन कर उसकी पहचान छिपाने में मदद करते हैं और उसे अपने बंगले में बुलाते रहते हैं। तमाम घटनाओं के बीच पता चलता है कि रूपा के मंगेतर रमेश को यह बात पता थी कि रूपा उसे नहीं रॉकी को पसंद करती है। शक की सुई अब रमेश की ओर घूम जाती है और तमाम सारे खेल-तमाशे, घात-प्रतिघात के बाद अंत में पता चल जाता है कि रूपा की मौत हत्या थी या आत्महत्या, और अगर ये मौत हत्या थी तो उसका कातिल कौन था?
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नासिर हुसैन की लिखी कहानी पर बनी इस फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में शम्मी कपूर, आशा पारेख और प्रेम चोपड़ा के अलावा हेलेन, इफ्तेखार, प्रेमनाथ और के. एन. सिंह जैसे मंझे हुए कलाकार थे। फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प तथ्य यह है कि लक्ष्मी छाया, राम अवतार और राज मेहरा जैसे अपने समय के श्रेष्ठ चरित्र कलाकारों के साथ फिल्म में एक छोटा सा रोल सलीम-जावेद की जोड़ी वाले सलीम खान ने भी किया है। रॉकी अपना राज छुपाने के लिए अपने जिस दोस्त को ‘द पार्क होटल’ होटल में ड्रमर बनाता है उस दोस्त का रोल करने वाला अदाकार कोई और नहीं सलमान खान के पिता सलीम खान हैं।
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साल 1961 में छोटे नवाब फिल्म से अपना करिअर शुरू करने वाले आर डी बर्मन ने तीसरी मंजिल से पहले भूत बंगला, तीसरा कौन और पति-पत्नी समेत कुल चार फिल्मों में संगीत दिया था लेकिन उनकी वास्तविक पहचान इसी फिल्म के संगीत ने बनाई। फिल्म में मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गए गीत आशा भोंसले और मोहम्मद रफी की आवाज में गाये गए और इन गीतों ने इस कदर धूम मचाई कि आज भी तमाम सारे लोग तीसरी कसम को उसके गीतों के लिए याद करते हैं। कहते हैं कि शुरुआत में शम्मी कपूर फिल्म के संगीत निर्देशन के लिए शंकर जयकिशन की जोड़ी के हिमायती थे पर कालांतर में आर डी बर्मन ने अपने संगीत से उन्हें आश्वस्त किया कि उनका संगीत कमजोर नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि मजरूह साहब ने शम्मी साहब से पंचम दा अर्थात आर डी बर्मन की पुरजोर सिफारिश की थी और कहा था कि पंचम को मौका मिलना चाहिए, कहना ना होगा कि मजरूह साहब ने वैसी पुरजोर सिफारिश पंचम दा के टैलेंट के कारण ही की होगी। फिल्म का निर्देशन और सम्पादन विजय आनंद का और छायांकन एम श्रीनिवास का था।
एक मिस्ट्री या सस्पेंस फिल्म के तौर पर तीसरी मंजिल को भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर माना जा सकता है। एक निर्देशक के तौर पर तीसरी मंजिल से जुडने से पहले विजय आनंद ने हर तरह की फिल्में बनाईं थी। नौ दो ग्यारह जैसी एक थ्रिलर, तेरे घर के सामने जैसी रॉम-कॉम और गाइड जैसी एक बेहद संजीदा फिल्म, पर तीसरी मंजिल ने यह तय कर दिया कि आने वाले समय में विजय आनंद को उनके थ्रिलर, मिस्ट्री और सस्पेन्स के ट्रीट्मेन्ट के लिए याद किया जाएगा। जब नासिर हुसैन ने फिल्म प्लान की थी तो उन्होंने देव आनंद को रॉकी के रोल में चुना था और खुद तीसरी मंजिल का निर्देशन कर रहे थे, फिल्म रंगीन बनाई जानी थी। गोल्डी आनंद को नासिर हुसैन ने राजेश खन्ना के लीड रोल वाली ब्लैक एण्ड व्हाइट फिल्म ‘बहारों के सपने’ के निर्देशन का दायित्व सौंपा था।
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फिल्म अभिनेत्री साधना की सगाई की पार्टी पर देव साहब ने जब नासिर साहब से ये शिकायत की कि आप मेरे भाई को ब्लैक एण्ड व्हाइट फिल्म में नए कलाकारों के निर्देशन का दायित्व सौंप रहे हैं तो नासिर साहब ने कहा कि ठीक है अब गोल्डी ‘तीसरी मंजिल’ के निर्देशक होंगे लेकिन देव साहब उसमें अदाकारी नहीं करेंगे बल्कि उसमें शम्मी कपूर मुख्य भूमिका करेंगे।
बाद में बहारों के सपने नासिर हुसैन ने खुद निर्देशित की। इस किस्से की पुष्टि नासिर हुसैन के भतीजे और मशहूर अभिनेता आमिर खान ने एक इंटरव्यू में खुद की है। ऐसा कहा जाता है कि फिल्म के सबसे मधुर गानों में से एक ‘तुमने मुझे देखा’ की शूटिंग से कुछ समय पहले ही उन्हें इस बात की खबर मिली कि उनकी पत्नी गीता बाली जिनका असली नाम हरकीर्तन कौर था, का निधन चेचक की बीमारी के कारण 21 जनवरी 1965 को हो गया। एक पेशेवर होने के नाते, उन्होंने निर्माता के खर्चों को देखते हुए शूटिंग जारी रखने की इच्छा जताई। इस तरह शोक में डूबे रहने के दौरान ही गाने की शूटिंग पूरी हुई। इसी पृष्ठभूमि के कारण गाने में उनका भावुक होना दिल को छू जाता है और गाने के अंत में जब आशा पारेख उनके विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा कर चली जाती है तो फटी-फटी आँखों से अपने प्रेम का ठुकराया जाना देखता अनिल और उसकी आँखों का खालीपन बहुत देर तक आपके मन में रहता है।
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सन पचास और साथ के दशक की मर्डर मिस्ट्री की फिल्में एक मामले में काफी हद तक समान रहा करती थीं, मुख्य विलेन पूरी कहानी में सिगरेट पीते, छतरी लिए चमकदार बूटों से पहचाना जाता था जिसके चेहरे पर रोशनी फिल्म के क्लाइमैक्स में पड़ा करती थी । तीसरी मंजिल का मुख्य विलेन या यूं कहें हत्यारा एक ठीक-ठाक समय तक विलेन के रूप में नहीं बल्कि चरित्र अभिनेता के रूप में दर्शकों के सामने रहता है और बहुत अंत में उसका पर्दाफ़ाश होता है ।
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दर्शकों को चकित होने का अवसर देती इस फिल्म ने अपने बाद आने वाली फिल्मों के लिए ये चुनौती जरूर छोड़ी है कि किस तरह वो फिल्में मर्डर मिस्ट्री के रसिया दर्शकों को ज्यादा से ज्यादा देर तक फिल्म से बांधे रख सकें और मुख्य विलेन या फिल्म के चौंकाने वाले किसी अन्य हिस्से को दर्शकों की नजरों से छिपाकर रख सकें। आशा पारेख ने फिल्म की शूटिंग से जुड़े अपने अनुभवों पर एक इंटरव्यू में बात करते हुए बताया था कि गोल्डी आनंद की तकनीक थी कि वो फिल्म को लंबे लंबे सीक्वेन्स में शूट करते थे और आज भले इससे फर्क ना पड़ता हो पर उस दौर में जब फिल्में कैमरा रोल में शूट की जाती थीं ये प्रयोग बहुत खर्चीला प्रयोग होता था क्योंकि अगर सीन बीच में काटना पड़े तो रोल का खर्च बढ़ जाया करता था।
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भावप्रणव अभिनय, मधुर गीत संगीत, मसूरी की वादियों के मनभावन रंगीन छायांकन को फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष माना जा सकता है। हत्यारा कौन है ये सवाल एक लंबी अवधि तक अनुत्तरित रहता है क्योंकि विजय आनंद अपने चुस्त निर्देशन से दर्शकों को कई सारे पत्रों पर शक करने को मजबूर कर देते हैं। पर फिल्म में कुछ एक कमियाँ भी हैं, कई बार लगता है कि नासिर हुसैन ने अपनी पिछली फिल्मों के सीन निकाल कर फिल्म में डाल दिए हैं और नए सीन गढ़ने में मशक्कत नहीं हुई है। कुछ आलोचक मानते हैं ऐसा उन्होंने शायद इसलिए करवाया होगा कि फिल्म को जब याद किया जाए तो नासिर हुसैन के साथ जोड़ कर याद किया जाए ना कि सिर्फ विजय आनंद के साथ। सीआईडी साल भर से हत्या की जांच कर रही है और किसी खास जांच के सुराग फिल्म में नहीं दिखाई देते पर फिल्मी पुलिस है दर्शकों को इतना सहयोग तो देना ही होगा।
साल 1966 में आई दो बड़ी मिस्ट्री फिल्मों में से एक तीसरी मंजिल ने मेरा साया से ज्यादा कमाई की और साल की तीसरी सबसे बड़ी फिल्म मानी जाती है। यूट्यूब और कुछ अन्य स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध यह फिल्म अपने सुरीले गीतों, मधुर संगीत, जबरदस्त अभिनय और बेहतरीन सस्पेंस के लिए देखी जानी चाहिए।
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