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Old Hindi Film Stories : सपनों में दिखते अजीब इत्तेफाक

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे काॅलम : 'गुमनाम है कोई' से साभार

by Vaibhav Mani Tripathi
Old Hindi Film Stories
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साल 1989 में नवीन निश्चल, सारिका, मोहन गोखले जैसे अभिनेताओं के अभिनय से सजी फिल्म आई अजीब इत्तेफाक। फिल्म की कहानी अर्पणा (सारिका) नाम की एक लड़की की है, जिसे एक धुंधले से सपने में दिखता है कि उसे कोई मार रहा है । घबराई अर्पणा की नींद खुलती है और वो तुरंत पुलिस को फोन कर कहती है कि उसे किसी ने मार दिया है।

घबराई अर्पणा को जब इन्स्पेक्टर नवीन (नवीन निश्चल) पूछते हैं कि अगर उसे किसी ने मार दिया है तो फिर वो फोन कैसे कर रही है? उसी समय अर्पणा की मकान मालकिन आशा (सुधा चोपड़ा) उसका फोन काट देती हैं और उसे समझाती हैं कि वो सपना देख रही है। पुलिस स्टेशन में इन्स्पेक्टर नवीन और मोहन (मोहन गोखले) अभी इस अजीब फोन कॉल के बारे में बात ही कर रहे होते हैं कि उन्हें एक दूसरा फोन आता है और पता चलता है कि फिल्मों में हीरोइन का काम करने वाली संध्या (डॉली जेना) नाम की एक लड़की का खून हो गया है। कत्ल की जांच को पहुंचे इन्स्पेक्टर नवीन और मोहन वहाँ ये देख कर हैरान हो जाते हैं कि संध्या का कत्ल बिल्कुल उसी अंदाज में किया गया है जैसे कि अर्पणा ने अपने सपने में देखा था।

पुलिस अर्पणा को कत्ल की जगह बुलाती है और उससे पूछताछ करती है पर अर्पणा तमाम कोशिशों के बाद भी कातिल का चेहरा या कोई अन्य पहचान नहीं बता पाती, हालांकि जब जूनियर इन्स्पेक्टर मोहन, अर्पणा पर शक करने लगता है तो सीनियर इन्स्पेक्टर नवीन उसे समझता है कि इस कत्ल में अर्पणा का हाथ होना मुमकिन नहीं है।

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पुलिस अपनी ओर से पता लगाने की कोशिश कर रही होती है कि उसी बीच एक और लड़की सोनी (नाजनीन) का कत्ल हो जाता है। लड़की कि निर्मम हत्या के बाद उसकी बॉडी उसके घर के बाथ टब में मिलती है। अर्पण को इस कत्ल से पहले भी कत्ल का सपना आया था पर पुलिस तक पहुँचने से उसे उसकी मकान मालकिन रोक लेती है। पर अगले दिन अखबार में कत्ल की खबर पढ़ कर वो रुक नहीं पाती और पुलिस के पास पहुँच जाती है। जहां पता चलता है कि बचपन में एक बार वो ऐसा ही हादसा देख चुकी है जब उसे सपने में अपने पिता की हत्या होते देखा था।

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पुलिस अभी इन दो अकेली रहने वाली लड़कियों की हत्या सुलझा नहीं पाई होती है और कातिल और अर्पणा के बीच संबंध की गुत्थी को सुलझा नहीं पा रही होती है तो मनोचिकित्सक (अरुण माथुर) पुलिस को इस स्थिति को एक्स्ट्रा सेंसरी पर्सेप्शन जैसी वैज्ञानिक अवधारणा से जोड़ कर देखने की सलाह देते हैं। डॉक्टर अर्पणा और कातिल के दिमाग के आपस में ट्यून-इन होने की बात कहते हैं। अपने सीनियर के निर्देश पर जूनियर इन्स्पेक्टर मोहन, अर्पणा से मेलजोल और दोस्ती बढ़ाने की बात करता है। इस बीच दर्शक जान जाते हैं कि कातिल कोई और नहीं बल्कि एक फैशन फोटोग्राफर कमल (मैक मोहन) है, जो इन लड़कियों को पहले प्रपोज करता है पर जब उसके प्रस्ताव को लड़कियां किसी कारण से अस्वीकृत कर देती हैं तो वो उनकी जान ले लेता है।

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कहानी में तीसरी लड़की रश्मि (रमा विज) भी आती है, जिसका बॉस उससे प्रेम तो करता है पर उसके साथ विवाह करना नहीं चाहता है। कमल अब रश्मि से नजदीकियाँ बढ़ाने की कोशिश कर रहा होता है पर इसी बीच रश्मि और उसका प्रेमी, उसका बॉस, उसके साथ शादी करने को तैयार हो जाता है और कमल के सपने एक बार फिर टूट जाते हैं। और फिर एक हत्या हो जाती है जब की अपर्णा ने तीन दिन पहले सपने में होने वाली हत्या और उस घर को भी देख लिया था जहां हत्या होगी और पुलिस को बता भी दिया था।

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एक अखबार का रिपोर्टर अनिल (ज्योति सरूप), जो इन हत्याओं में खासी दिलचस्पी ले रहा था, इस खबर को अपर्णा के चित्र के साथ अखबार में छाप देता है कि पुलिस को तीन दिन पहले अपर्णा ने कत्ल होगा इसकी सूचना दे दी थी। इस खबर के कारण अपर्णा के जीवन पर संकट आ जाता है और अपर्णा के पीछे कमल पड़ जाता है। इस स्थिति को पुलिस एक मौके की तरह लेती और अपर्णा की निगरानी करती है, एक दाढ़ी वाला बन्दा पकड़ा जाता है पर वो कातिल नहीं ये पुलिस को जल्द पता चल जाता है। इधर कमल मोहन और अर्पणा का पीछा करते हुए मोहन के घर पहुँच जाता है जहां अर्पणा अकेली है। जैसे ही पुलिस को खतरे का अंदाज होता है पुलिस की टीम अर्पणा को बचाने मोहन के घर की ओर दौड़ पड़ती है और कमल मारा जाता है, अर्पणा बचा ली जाती है ।

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फिल्म की पटकथा, कथा, निर्देशन और सम्पादन का दायित्व ज्योति सरूप ने निभाया था। कैमरा राजेश जोशी का और संवाद इकबाल दुर्रानी ने लिखे थे। फिल्म का निर्माण मीना श्रीवास्तव का और संगीत, गौतम रॉय का था। गौतम रॉय ने न् सिर्फ फिल्म में संगीत दिया था बल्कि फिल्म के गीत भी लिखे थे और पार्श्व गायन भी किया था। फिल्म के निर्देशक ज्योति सरूप ने फिल्म में अनिल नाम के प्रेस रिपोर्टर की छोटी सी पर महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई थी और उन्हें इस फिल्म के अलावा मशहूर टीवी धारावाहिक बुनियाद और राष्ट्रीय एकता और सद्भावना के लिए दिए जाने वाले नरगिस दत्त पुरस्कार से पुरस्कृत फिल्म बुब के निर्देशन के लिए जाना जाता है। प्रसिद्ध धारावाहिक महाभारत में अर्जुन की भूमिका निभाने वाले अर्जुन (फिरोज खान) ने रेस्तरां में गायक की और विजेन्द्र घाटगे ने अर्पणा के प्रेमी की भूमिकाएँ निभाईं और दोनों के हिस्से एक एक गीत भी आया।

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फिल्म को रोमांच की फिल्म कह सकते हैं, रहस्य की नहीं क्योंकि धुंधले में कत्ल दिखाते हुए निर्देशक ने मैक मोहन अर्थात कमल की पहचान छिपाने का कोई यत्न नहीं किया है। फिल्म का सबसे बड़ा रहस्य यह है कि सारिका द्वारा निभाए गए पात्र का नाम क्या है? क्योंकि आधे चरित्र उसे अर्पणा कह रहे हैं और शेष आधे उसे अपर्णा कह रहे हैं। सम्पादन में ऐसी भयंकर भूल का रह जाना कहीं से क्षम्य नहीं माना जा सकता वो भी तब जब निर्देशक द्वारा अपनी कहानी पर बनी फिल्म का खुद सम्पादन किया गया हो। और पहले सीन से ही फिल्मों के शौकीन मैक मोहन को धुंधले स्वरूप में कत्ल करते देख कर पहचान लेते हैं। निर्देशन इतना कमजोर है कि सारिका जैसी समर्थ अभिनेत्री और एक मजबूत प्लॉट के होते हुए भी सपने से जागी अर्पणा का कोई दृश्य खास प्रभावी नहीं दिखता।

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फिल्म में नवीन निश्चल का अभिनय बहुत सहज है और फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है। कुछ एक दृश्यों में रमा विज और सारिका बहुत सहज दिखती हैं पर पूरी फिल्म में उनकी सहजता कायम नहीं रह पाती। मोहन गोखले जैसे समर्थ अदाकार को कभी पत्रकार पर तो कभी अर्पणा पर गुस्सा करने और जुमले कहने के लिए इस्तेमाल किया गया है और वो काम भी मोहन गोखले काफी शिद्दत से करते दिखाई देते हैं, पर फिल्म के कमजोर संवाद उनका उचित प्रभाव नहीं पैदा होने देते। फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है, लगभग सवा घंटे की फिल्म है और नवीन निश्चल के सहज अभिनय के लिए देखी जा सकती है, हाँ यदि आप एक अच्छी मिस्ट्री फिल्म खोजने वाले दर्शक हैं तो फिल्म आपको बेतरह निराश करेगी।

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