
धुंध से घिरी एक रात में तेज़ी से चल रही एक कार अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो जाती है और कार का चालक चंद्रशेखर (नवीन निश्चल) मदद की तलाश में पास के एक मकान तक पहुँचता है। दरवाज़ा खटखटाने पर जब कोई जवाब नहीं मिलता तो वह भीतर चला जाता है, घर के अंदर व्हीलचेयर पर उसे एक आदमी दिखाई देता है जब वो उससे टेलीफोन इस्तेमाल करने की अनुमति माँगता है तब उसे पता चलता है कि व्हीलचेयर पर बैठे आदमी की मृत्यु हो चुकी है ।

अभी लाश देखने के सदमे से चंद्रशेखर बाहर भी नहीं आ पाता कि उसे सामने हाथ में पिस्तौल लिए एक युवती दिखाई देती है जो बताती है कि मरने वाला व्यक्ति ठाकुर रंजीत सिंह (डैनी डेजोन्गपा) था और वो उसकी पत्नी रानी (ज़ीनत अमान) है। रानी यह स्वीकार करती है कि अपने निर्दयी पति रंजीत की हत्या उसी ने की क्योंकि उसने ना सिर्फ रीना का बल्कि पूरे परिवार का जीवन नरक बना रखा था, आदमी तो आदमी उसने बेज़ुबान जानवरों तक को निशाना लगाने के लिए इस्तेमाल कर अपने हैवान होने का पक्का सबूत दे रखा था। उस रात रोज की तरह होने वाले एक झगड़े में रंजीत ने पिस्तौल निकाल ली और आपसी हाथापाई में गोली चल गई और रंजीत मारा गया।
चंद्रशेखर पूछता है कि जब गोली चली तो किसी ने सुना क्यों नहीं? तो रानी जवाब देती है कि वो दिन भर बिना सोचे समझे जानवरों पर गोलियां चलाते रहते थे, इसलिए गोलियों की आवाज सुन कर कोई नहीं आया। उसकी कहानी सुन कर चंद्रशेखर उसे बचाने का निश्चय करता है और फिर दोनों मिलकर एक नकली चोरी का नाटक रचते है जिससे कि हत्या का समय बदलकर दिखाया जा सके और रानी को इस इल्जाम से बचाया जा सके। जब पुलिस घटनास्थल पर पहुँचती है तो उसे जेब घड़ी, सिगार का खाली डिब्बा और चाय की ट्रे मिलती है।

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अपनी तफतीश के दौरान पुलिस पहला शक, रंजीत के रंगीनमिजाज नौकर बाँकेलाल (देवेन वर्मा) पर करती है जो एक नाचनेवाली के कोठे पर मिलता है। जब बाँके लाल पुलिस को मिलता है तो उसने रंजीत का कोट पहना रहता है और उसके जेब से पैसे भी मिलते हैं, पर पुलिस की जांच में पता चलता है उसने वो पैसे सट्टेबाजी में जीते थे। इसके बाद पुलिस का शक रंजीत की सौतेली माँ (उर्मिला भट्ट), रंजीत की पत्नी रानी से लेकर रंजीत के मानसिक रूप से अस्वस्थ भाई तक सब पर बारी बारी से जाता है पर घटनास्थल पर मिले उंगलियों के निशान व सिगार का डब्बा, शहर के नामी वकील और रानी के प्रेमी सुरेश सक्सेना (संजय खान), को शक के दायरे में ले आते हैं।
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सुरेश पर हत्या का आरोप इसलिए और भी पुख्ता हो जाता है क्योंकि सुरेश पुलिस को बताता है कि हत्या के समय वो पार्टी में था, पर पुलिस को पता चलता है कि वह एक घंटे के लिए वहाँ से गायब था। पुलिस, सुरेश को गिरफ्तार कर लेती है और उस पर हत्या का मुकदमा चलाया जाता है। तेजतर्रार सरकारी वकील मिस्टर मेहता (अशोक कुमार) के सवालों का संतोषजनक जवाब ना होने पर जब रानी को लगता है कि उसके द्वारा किए गए खून के कारण कहीं बेकसूर सुरेश को फांसी ना हो जाए तो रानी अदालत में अपना जुर्म स्वीकार कर लेती है। रानी के बयान के आधार पर, चंद्रशेखर को गवाही के लिए अदालत में बुलाया जाता है, चंद्रशेखर की गवाही से ना सिर्फ पूरा मामला ही कुछ और निकलता है बल्कि सभी निर्दोष छूट भी जाते हैं।
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जासूसी कहानियों की मशहूर लेखिका अगाथा क्रिस्टी के मशहूर नाटक ‘द अनएक्सपेक्टेड विज़िटर’ पर आधारित इस फिल्म की पटकथा मशहूर लेखक अख्तर-उल-ईमान ने अख्तर मिर्जा और सी जे पवरी के सहयोग से लिखी थी और निर्माता और निर्देशक बी.आर.चोपड़ा थे। संगीत अपने दौर के नामचीन संगीतकार रवि का था और साहिर लुधियानवी के गीतों को आशा भोंसले, उषा मंगेशकर, महेंद्र कपूर और मन्ना डे ने अपनी आवाज दी। फिल्म का सम्पादन प्राण मेहरा और छायांकन धरम चोपड़ा का था। फिल्म में कुछ प्रभावी भूमिकाओं में अपने समय के मशहूर चरित्र अभिनेता भी देखे जा सकते हैं, जज की भूमिका में नाना पल्सिकर, इन्स्पेक्टर जोशी के रूप में मदन पुरी, इन्स्पेक्टर बक्शी के रूप में जगदीश राज तो थे ही एक गीत के लिए पद्मा खन्ना और जयश्री टी को भी अतिथि भूमिकाओं में देखा जा सकता है।
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फिल्म की कहानी, अदाकारों का सधा हुआ अभिनय, खूबसूरत लोकेशन और देवेन वर्मा की जबरदस्त कॉमिक टाइमिंग फिल्म की विशेषता है। ज़ीनत अमान ना सिर्फ फिल्म में खूबसूरत दिखाई देती हैं बल्कि अपने अभिनय की गहराई से अपने प्रशंसकों द्वारा आज भी याद राखी जाती हैं। अपने चरित्र के अनुकूल आवश्यक दुख, उलझन और राहत एक साथ प्रदर्शित करती जीनत धुंद से पहले हरे रामा हरे कृष्णा जैसी यादगार फिल्म में जसबीर के किरदार के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित की जा चुकी थीं और इस फिल्म में भी उनकी अदाकारी में गजब का आत्मविश्वास दिखता है। संजय खान का अभिनय भी बढ़िया है पर फिल्म में सबसे सशक्त अभिनय चंद्रशेखर की भूमिका निभा रहे नवीन निश्चल ने किया है और मदन पुरी एक खुशमिजाज लेकिन तेज तर्रार पुलिस वाले के रूप में दर्शकों को खासे पसंद आते हैं। फिल्म के अन्य गीत में नृत्यांगना का किरदार उमा धवन ने निभाया है जिन्हें बहुत से दर्शक बेशरम फिल्म में चन्दा के किरदार के लिए याद करते हैं।
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फिल्म के कुछ एक संवाद तो ऐसे हैं कि जिन्हें आज देखते हुए सुना जाए तो युवा अच्छे खासे मीम और रील बनने लायक मसाला तलाश लेंगे। ‘मात तो मुझे ज़िंदगी भी नहीं दे सकी लीडर, तो तुम क्या दोगे’, एक दृश्य में जब रंजीत, रानी और सुरेश पहाड़ी के छोर पर खड़े होते हैं तो रंजीत रानी से कहता है कि,’मुझे मालूम है कि तुम क्या सोच रही हो? यही ना कि इस पहाड़ी के छोर से धक्का दे दूँ तो हड्डी पसली बराबर हो जाए, मगर तुममे ऐसा करने की हिम्मत नहीं।” इसके जवाब में सुरेश रंजीत से कहता है कि “हिंदुस्तान की औरत ने अभी तक अपने पति को मारना नहीं सीखा, चाहे वो जानवर ही क्यों ना हो।” देश में बीते दिनों हुई कुछ एक हत्याओं की खबरों पर मीम बनाने वालों को ऐसे और भी संवाद फिल्म में प्रचुर मात्रा में मिलेंगे।
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फिल्म का नाम ‘धुंद’ है। सामान्य तौर पर अंग्रेजी में जिसे फॉग कहा जाता है वैसे मौसम को ‘धुंध’ लिखा और पढ़ा जाता है। इस अलग वर्तनी का कोई खास कारण नहीं मिलने से ये अंदाज लगाया जा सकता है कि ‘धुंद’ (अंग्रेजी में dhund) वर्तनी के पीछे या तो किसी अंकज्योतिष के जानकार की सलाह होगी अथवा ऐसा भी हो सकता है कि ‘धुंध’ के नाम से किसी और ने टाइटल रजिस्टर करवा लिया हो और मजबूरी में बी आर फिल्म्स को गलत वर्तनी वाली फिल्म रिलीज करनी पड़ी हो, पर ये सब सिर्फ संभावनाएँ हैं।
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फिल्म लगभग पैंतीस लाख के बजट में बनी और कमाई के मामले में इस फिल्म ने पचहत्तर लाख का मार्क पार किया था और उस साल की हिट फिल्मों में थी। डैनी द्वारा निभाए गए रंजीत सिंह के रोल के लिए निर्माताओं ने पहले अमिताभ बच्चन से संपर्क किया और उनके इनकार के बाद शत्रुघ्न सिन्हा को। अमिताभ ने रोल खुद ठुकराया था और कहते हैं कि शत्रुघ्न सिन्हा को रोल इसलिए नहीं मिला था क्योंकि वो स्टोरी नैरेशन के लिए देरी से पहुंचे थे और ये बात बी आर चोपड़ा को पसंद नहीं आई थी। नतीजा 12 फरवरी 1973 को रिलीज इस फिल्म में डैनी ने अड़ियल,गुस्सैल और घमंडी पति रंजीत का किरदार निभाया और यह रोल उनकी यादगार भूमिकाओं की सूची में शामिल हुआ।
एक जेन्युइन सस्पेन्स फिल्म देखने का मन है और यूट्यूब पर दिखने वाले अत्यधिक विज्ञापन बहुत परेशान ना करते हों तो फिल्म अवश्य देखी जानी चाहिए, क्योंकि अन्य किसी प्लेटफॉर्म पर धुंद अभी उपलब्ध नहीं है। अगाथा क्रिस्टी की कहानियों के फैन हैं तो फिल्म आपको निराश नहीं करती और कहना ना होगा कि अख्तर उल ईमान और अख्तर मिर्जा द्वारा कहानी का ऐडप्टैशन बहुत समझदारी से किया गया है।
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