
Jharkhand Bureaucracy : सावन के मौसम में सुबह-सुबह गुरु के पूजा वाले कमरे से रामचरितमानस की चौपाइयां सुनाई दे रही थीं ‘उमा कहउँ मैं अनुभव अपना, सत हरि भजनु जगत् सब सपना…’। थोड़ी देर बाद गुरु निकले। सामने बैठा देखकर चौंके। पूछा, ‘आप कब आए?’ जवाब दिया, ‘गुरु जब भगवान शिव माता उमा को हरि भजन की महिमा बता रहे थे’। गुरु के चेहरे पर मुस्कान दौड़ गई। प्रसन्न देखकर बगैर समय गंवाए सीधे मुद्दे पर आ गया – गुरु एक बात पूछें? जब जगत सपना है तो फिर ‘ज्ञान’ के महकमे में इतनी मारामारी क्यों?
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गुरु फिर मुस्कराए। बोले, भगवान का भजन अलग चीज है और कुर्सी का अलग। भगवान के भजन में मुक्ति मिलती है और कुर्सी के भजन में मनचाहा फल। तो क्या तबादला भी साधना है? गुरु बोले, बिल्कुल। फर्क इतना है कि यहां माला की जगह फाइल होती है और मंत्र की जगह… ‘पत्रपुष्प’। गुरु बोलते रहे, …जिस महकमे के तबादले को लेकर तुम्हारी सुई अटकी है, वहां खेल का एक बड़ा हिस्सा यह भी है। वनांचल में सबसे कठिन प्रकिया ‘माट्साब’ का स्थानांतरण है। यह इतनी जटिल है कि एक से दूसरी जगह हिलना मुश्किल है। दूसरी ओर विभाग के हाकिम बेरोकटोक अपनी मर्जी की कुर्सी बदल रहे हैं। मौजूदा ‘तबादला रेल’ में अधिकतर लोगों की सीट पहले से तय थी। लास्ट आवर में कई वेटिंग टिकट भी कन्फर्म हो गए। कई ऐसे भी हैं, जिनका टिकट सीधे ड्राइवर के केबिन से निकला।
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गुरु ने बताया, इसे व्यवस्था कहते हैं। यह सुनते ही फिर पूछा- और कीमत? गुरु बोले, अरे, कीमत मत कहो। यह तो ‘सुविधा शुल्क’ है। बड़ा हिस्सा कारोबारी विकास के लिए है। वैसे भी वनांचल में हर मनोकामना के लिए अलग साधना है। हर साधना का अपना फल। बस साधना स्थल बदलता है। साधक की निष्ठा यथावत रहती है। गुरु पूरी तरह खुल गए थे। लिहाजा मौजूदा साधक के बारे में और जानने की उत्कंठा हुई। पूछा, गुरु चर्चा है कि ‘साहब’ का मन अब सरकारी फाइलों में कम लग रहा। कारोबारी काम में ज्यादा।
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कोई मॉल की चर्चा करता है, कोई एप की। कोई कहता है कि साम्राज्य बढ़ रहा है। लिहाजा कमान किसी विश्वस्त को सौंप दी गई है। सरकारी नौकरी और इतना बड़ा कारोबारी विस्तार? गुरु बोले, तुम नादान हो। आदमी अकेले कहां विस्तार करता है? माहौल चाहिए, सहयोग चाहिए। और सबसे जरूरी ऊपर वाले का आशीर्वाद। गुरु रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। बोले, ‘जिस हाकिम को महकमा ‘‘अपना’’ लगने लगे, वह अपने रास्ते खुद-ब-खुद बना लेते हैं। फाइलें चलती हैं, आदेश निकलते हैं। अभीष्ट की प्राप्ति होती है’।
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गुरु की स्पीड पर ब्रेक लगाते हुए धीरे से पूछा -अगर चर्चाएं सच हुईं तब? गुरु ने कहा, तब तो यह ‘जगत’ सपना नहीं रहेगा। जांच की फाइल बन जाएगी। हालांकि, तुम जिनकी बात कर रहे हो, उन्हें ‘मोक्ष’ मिल चुका होगा। आरोप लगेंगे, चर्चा होगी और फिर सब खत्म। ‘साहब’ की अपनी पकड़ किस दिन काम आएगी? अब आखिरी सवाल किया- इस पूरे प्रसंग का सार क्या है? गुरु ने कहा, सार इतना ही है कि वनांचल में इन दिनों दो तरह के भजन चल रहे हैं।
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एक पूजाघर में हरि भजन, दूसरा दफ्तर में ‘कुर्सी भजन’। पहले में आंखें बंद होती हैं, दूसरे में खुली। दोनों में एक ही समानता है, साधक को अपने साध्य का पता होता है। इस अमूल्य ज्ञान के बाद गुरु के चरण छुए। ऊपर से आवाज आई, कहां खबरों की दुनिया में फंसे हो, सावन चल रहा है, उमा और शंकर की आराधना में मन रमाओ। कांवर लो और देवघर जाओ।
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