
Jharkhand Bureaucracy : गुरु के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी। जाहिर था, कोई बड़ा राज दबाए बैठे थे। देखते ही समझ गया पिटारे से कुछ खास निकलने वाला है। बातचीत की शुरुआत उलाहना से हुई, ‘आइए महोदय! कहां रहते हैं आजकल? व्यस्तता कुछ ज्यादा बढ़ती जा रही है आपकी?’ कभी बिना मतलब भी नाचीज की खबर ले लीजिए। गुरु के तंज पर समर्पण ही विकल्प था। सो, अभिवादन करते हुए कहा- इधर कुछ उलझ गया था। सुलझते ही हाजिरी लगाने पहुंच गया। आप बताएं, क्या कुछ चल रहा है, आपके मोहल्ले में? गुरु मानो इसी जवाब की प्रतीक्षा में थे।
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बात पूरी होते ही शुरू हो गए। कहा- इन दिनों मोहल्ले में बालू के ‘भालू’ की चर्चा है। अनजान बनते हुए सवालभरी नजरों से गुरु की ओर देखा। गुरु ने प्रसंग वाचन प्रारंभ किया। बताया कि एक हुजूर को निजी काम के लिए बालू की दरकार थी। खनिज भंडार से भरे-पूरे राज्य में यह कौन सी बड़ी डिमांड थी? लिहाजा सिस्टम काम में जुट गया। डायरेक्शन पर डायरेक्शन आने लगे। निचले हाकिम ने जैसे-तैसे बालू लदी गाड़ियों का काफिला रवाना कर दिया।
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असली ट्विस्ट अब फंसा। रवानगी के दौरान रास्ते में भूरे रंग वाले कुछ ‘भालू’ खड़े हो गए। वनांचल में वाहनों के पहिए थम गए। अब सूचना का प्रवाह नीचे से ऊपर की ओर होने लगा। सबसे ऊपर वाले हुजूर, जिन्होंने डायरेक्शन दिया था, पूरे विवाद से पल्ला झाड़ लिया। पूरी कवायद इस बात की होने लगी कि रास्ते में फंसे वाहन येन-केन-प्रकारेण गंतव्य तक पहुंचाए जाएं। हुजूर की भृकुटी तन गई।
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शायद इस धर-पकड़ में साजिश का खेल नजर आने लगा। हुजूर के तेवर देख महकमे में भूचाल आ गया। मानो कुंडली मारे बैठे ‘राहु’ पर शनि की साढ़ेसाती चढ़ गई। कुर्सी हिलने लगी। जरा सी बात का बतंगड़ बनने की प्रबल आशंका थी। लिहाजा आनन-फानन क्राइसिस मैनेजमेंट को सक्रिय किया गया। साहब के सिर इस बात का ठीकरा फूटा कि उन्होंने पूरे सिस्टम को फंसा दिया। बहरहाल, मामला जैसे-तैसे ठंडा हुआ। बताने वाले दावा कर रहे हैं कि आग तो बुझ गई है, राख में चिंगारी अब भी दबी है। गुरु ने एक ही सांस में पूरा वृत्तांत सुना दिया। कुछ पूछने-जानने को शेष नहीं था। सो, मनन करते हुए हाथ जोड़े और निकल पड़ा। मन में अब एक ही विचार था, वनांचल में बालू जो भी कराए, कम है।
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