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यात्रा वृतांत : हिमाचल का गांव, जहां पहाड़ साझा करते मौन

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
यात्रा वृतांत
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कुछ यात्राएं किसी जगह तक पहुंचने के लिए नहीं होतीं ; वे उन जगहों से दूर जाने के लिए होती हैं, जहां हम पहले ही कई बार पहुंच चुके होते हैं। शिमला और मनाली मेरे लिए ऐसे ही दो नाम थे। वर्षों पहले जब पहली बार हिमाचल गया था, तब इन्हीं शहरों ने पहाड़ों से परिचय कराया था। मॉल रोड की चहल-पहल, रोहतांग की भीड़, कैफे, होटल और लगातार चलती पर्यटकों की आवाजाही- इन सबने हिमालय का एक चेहरा दिखाया था। सुंदर था, लेकिन अधूरा। समय के साथ मुझे यह महसूस होने लगा कि पहाड़ों की असली भाषा भीड़ में नहीं, बल्कि उन पगडंडियों पर मिलती है, जहां सड़कें धीरे-धीरे अपना दावा छोड़ देती हैं। इसी तलाश ने मुझे दिल्ली से शानगढ़ की ओर चलने के लिए प्रेरित किया।

दिल्ली की सुबह हमेशा की तरह जल्दबाज़ थी। सड़कों पर भागती गाड़ियां, मेट्रो की रफ्तार और मोबाइल स्क्रीन में उलझे चेहरे। लेकिन जैसे-जैसे गाड़ी हरियाणा को पार करती हुई हिमाचल की सीमा में प्रवेश करने लगी, दृश्य बदलने लगे। मैदान धीरे-धीरे पहाड़ियों में बदल गए। हवा में नमी बढ़ी और सड़कों के दोनों ओर देवदार दिखाई देने लगे। हिमाचल पहुंचते ही पुरानी यात्राएं अनायास ही याद आने लगीं। शिमला की व्यस्त सड़कें, मनाली का शोर, पर्यटकों से भरे होटल और लंबा ट्रैफिक। कभी यही सब आकर्षण लगता था, लेकिन इस बार मन किसी और जगह की तलाश में था—ऐसी जगह, जहां पहाड़ अब भी अपने स्वाभाविक मौन में सांस लेते हों। औट पार करते ही सड़क सैंज घाटी की ओर मुड़ गई। यहीं से यात्रा का वास्तविक स्वर बदल गया। सड़क संकरी होने लगी, वाहनों की संख्या कम होती गई और घाटी में बहती सैंज नदी पूरे रास्ते साथ चलने लगी। नदी का संगीत इतना सहज था कि गाड़ी का इंजन भी उसकी लय में धीमा पड़ता हुआ महसूस हुआ।

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कुछ देर बाद जब पहली बार शानगढ़ का विस्तृत घास का मैदान सामने आया, तो मैं अनायास ही गाड़ी से उतर गया। पहाड़ों के बीच इतना बड़ा समतल मैदान देखना अपने आप में एक आश्चर्य था। चारों ओर देवदार और कैल के ऊंचे वृक्ष प्रहरी की तरह खड़े थे और बीच में फैला हरा मैदान किसी प्राचीन लोककथा का दृश्य लगता था। यहां न मॉल रोड थी, न सेल्फ़ी लेने की भीड़, न ऊंची आवाज़ में बजता संगीत। केवल हवा थी, घास थी और दूर चरती गायों की घंटियों की धीमी ध्वनि।

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शानगढ़ पहली नज़र में किसी पर्यटन स्थल से अधिक एक जीवित परिदृश्य लगता है। यहां प्रकृति सजाई नहीं गई है; वह अपने मूल रूप में उपस्थित है। लकड़ी और पत्थर से बने पारंपरिक हिमाचली घर, खेतों की मेड़ों पर चलते ग्रामीण, दूर दिखाई देता प्राचीन शांगचूल महादेव मंदिर और हवा में घुली देवदार की सुगंध- सब मिलकर यह एहसास कराते हैं कि यह गांव अभी भी अपने समय के साथ चल रहा है, पर्यटन के समय के साथ नहीं। उस क्षण मुझे लगा कि शायद हिमालय की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी ऊंचाई में नहीं, बल्कि उसकी सादगी में है। शानगढ़ उसी सादगी का सबसे सुंदर परिचय है।

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शानगढ़ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां घूमने का अर्थ केवल दर्शनीय स्थलों की सूची पूरी करना नहीं है। यह वह गांव है, जहां चलना ही यात्रा बन जाता है। सुबह की पहली किरण के साथ जब मैं मैदान की ओर निकला, तो ओस से भीगी घास पर पड़ती धूप किसी चित्रकार के कैनवास जैसी लग रही थी। हवा में देवदार की गंध थी और दूर कहीं से आती पक्षियों की आवाज़ें उस सन्नाटे को संगीत में बदल रही थीं।

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मैदान के एक छोर पर स्थित शांगचूल महादेव मंदिर इस गांव की आत्मा जैसा प्रतीत होता है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यह देवता आज भी पूरे क्षेत्र की रक्षा करते हैं। मंदिर की वास्तुकला पूरी तरह पारंपरिक हिमाचली शैली में बनी है—पत्थर और लकड़ी का ऐसा संतुलन, जो प्रकृति पर अधिकार नहीं जताता बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व की भावना व्यक्त करता है। मंदिर परिसर में बैठकर मुझे लगा कि हिमालय में आस्था का सबसे सुंदर रूप शायद यही है- जहां शोर नहीं, केवल उपस्थिति होती है।

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शानगढ़ की यात्रा ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क की सीमा तक पहुंचे बिना अधूरी मानी जाती है। यह यूनेस्को विश्व धरोहर क्षेत्र केवल जैव-विविधता का केंद्र नहीं, बल्कि हिमालय के उस मौलिक स्वरूप का परिचय भी है, जो अब बहुत कम जगहों पर बचा है। पार्क की ओर जाती पगडंडियों पर चलते हुए हर मोड़ नया दृश्य खोल देता है- कहीं ऊंचे देवदारों का घना जंगल, कहीं पहाड़ी झरनों की पारदर्शी धारा और कहीं दूर बर्फ़ से ढकी चोटियां बादलों के बीच झांकती हुई। यहां ट्रेकिंग किसी उपलब्धि की तरह नहीं लगती; यह प्रकृति के साथ संवाद करने का माध्यम बन जाती है।

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दोपहर तक लौटते-लौटते भूख भी पहाड़ी हवा की तरह सच्ची हो चुकी थी। मैंने एक छोटे से होमस्टे में स्थानीय भोजन का स्वाद लिया। लकड़ी के बने उस घर की खिड़की से पूरा मैदान दिखाई देता था। भोजन में राजमा, स्थानीय दाल, ताज़ी सब्ज़ियां, घी और गर्म चावल थे। स्वाद मसालों का नहीं, ताज़गी का था। बातचीत के दौरान होमस्टे के मालिक ने बताया कि कुछ वर्ष पहले तक बहुत कम लोग शानगढ़ का नाम जानते थे, लेकिन अब धीरे-धीरे ऐसे यात्री आने लगे हैं जो भीड़ नहीं, शांति की तलाश में निकलते हैं। शायद यही कारण है कि यहां बड़े होटलों की जगह छोटे होमस्टे अधिक दिखाई देते हैं, जहां अतिथि पर्यटक कम और घर का सदस्य अधिक महसूस करता है।

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शाम होते-होते मैदान का रंग बदलने लगा। सुनहरी धूप धीरे-धीरे देवदारों के पीछे उतर रही थी। बच्चे खेल रहे थे, कुछ महिलाएं खेतों से लौट रही थीं और हवा पहले से अधिक ठंडी हो गई थी। उस क्षण लगा कि शानगढ़ किसी पर्यटन स्थल से अधिक एक जीवित लय है, जो अपने समय से चलती है। यहां घड़ी की सुइयां नहीं, सूरज और मौसम दिनचर्या तय करते हैं।

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अगली सुबह दिल्ली लौटने का समय था। गाड़ी जब सैंज घाटी से वापस मुख्य मार्ग की ओर बढ़ने लगी, तो बार-बार पीछे मुड़कर देखने का मन होता रहा। शानगढ़ धीरे-धीरे आंखों से ओझल हो गया, लेकिन उसकी शांति भीतर बनी रही। लौटते हुए फिर वही सड़कें थीं, वही पहाड़ और आगे जाकर वही भीड़, जिसे छोड़कर मैं यहां आया था। फर्क बस इतना था कि इस बार मेरे भीतर भी थोड़ा-सा हिमालय साथ लौट रहा था।

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यदि आप हिमाचल को केवल शिमला और मनाली की भीड़ से जानते हैं, तो एक बार शानगढ़ ज़रूर जाइए। वहां आपको कोई बड़ा बाज़ार नहीं मिलेगा, न रोमांच बेचते विज्ञापन। मिलेगा तो केवल एक विस्तृत हरा मैदान, देवदार की महक, पहाड़ों का मौन और वह सुकून, जो यात्रा खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आपके भीतर बना रहता है। शायद यही किसी भी सफल यात्रा की सबसे बड़ी पहचान है।

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