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यात्रा वृतांत : इतिहास, शौर्य व समय की धड़कन

दैनिक समाचार पत्र द फोटोन न्यूज के साहित्य पेज के लिए लिखे गए कॉलम : घुमक्कड़ की पाती से साभार

by Sanjaya Shepherd
यात्रा वृतांत
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यात्राएं केवल नए स्थानों को देखने का माध्यम नहीं होतीं, बल्कि वे हमें इतिहास, संस्कृति और मानव सभ्यता की उन परतों से भी परिचित कराती हैं, जो पुस्तकों के पन्नों से निकलकर वास्तविक जीवन में हमारे सामने खड़ी हो जाती हैं। बिहार के रोहतास जिले में स्थित सासाराम की मेरी यात्रा भी कुछ ऐसी ही रही। यह केवल एक शहर की यात्रा नहीं थी, बल्कि भारत के मध्यकालीन इतिहास, स्थापत्य कला, लोकजीवन और प्रकृति के अद्भुत संगम से साक्षात्कार करने का अवसर थी।

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दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी से निकलकर जब मैं सासाराम की ओर रवाना हुआ, तब मन में उत्सुकता थी। बचपन से इतिहास की किताबों में शेरशाह सूरी का नाम पढ़ता आया था। ग्रैंड ट्रंक रोड के निर्माता और कुशल प्रशासक के रूप में उनकी पहचान हमेशा मुझे आकर्षित करती रही थी। जब यह पता चला कि उनका भव्य मकबरा सासाराम में स्थित है, तब इस ऐतिहासिक नगर को देखने की इच्छा और प्रबल हो गई।

दिल्ली से मेरी यात्रा रेलमार्ग से शुरू हुई। रातभर की यात्रा के बाद सुबह जब ट्रेन बिहार की धरती पर प्रवेश कर रही थी, तब खिड़की से बाहर का दृश्य मन को मोह रहा था। दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत, ताड़ और आम के वृक्ष, छोटे-छोटे गांव और खेतों में काम करते किसान भारतीय ग्रामीण जीवन की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत कर रहे थे। धीरे-धीरे ट्रेन सासाराम स्टेशन पर पहुंची और मेरी ऐतिहासिक यात्रा का नया अध्याय आरंभ हुआ।

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स्टेशन से बाहर निकलते ही सासाराम का शांत और आत्मीय वातावरण महसूस हुआ। यह शहर आधुनिकता और इतिहास के बीच एक सुंदर संतुलन बनाए हुए दिखाई देता है। शहर की गलियों में चलते हुए ऐसा लगता है कि अतीत आज भी यहां की हवाओं में सांस ले रहा है।

सासाराम की यात्रा का पहला पड़ाव था शेरशाह सूरी का मकबरा। जैसे ही मैं उस विशाल स्मारक के सामने पहुंचा, उसकी भव्यता देखकर कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गया। एक विशाल जलाशय के बीच स्थित यह मकबरा भारतीय-इस्लामी स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह संरचना दूर से किसी राजमहल जैसी प्रतीत होती है।

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इतिहासकार इसे उत्तर भारत के सबसे सुंदर मकबरों में गिनते हैं। मकबरे तक पहुंचने के लिए बने पुल से गुजरते हुए ऐसा महसूस हो रहा था मानो मैं पांच सौ वर्ष पुराने इतिहास में प्रवेश कर रहा हूं। विशाल गुंबद, नक्काशीदार दीवारें और स्थापत्य की बारीकियां उस युग की कला और तकनीकी दक्षता की कहानी कहती हैं। वहां खड़े होकर मैंने कल्पना की कि किस प्रकार शेरशाह सूरी ने भारत के प्रशासन और सड़क व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन किए होंगे।

इसके बाद मैंने रोहतासगढ़ किले की ओर रुख किया। कैमूर पर्वतमाला पर स्थित यह विशाल दुर्ग बिहार के सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थलों में गिना जाता है। किले तक पहुंचने का मार्ग रोमांच से भरपूर है। पहाड़ियों के बीच से गुजरते हुए जब मैं ऊपर पहुंचा, तो सामने फैली प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक अवशेषों ने मन मोह लिया। यह किला कभी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता था। इसकी विशाल प्राचीरें, प्राचीन द्वार और महल आज भी अपने गौरवशाली अतीत की कहानी सुनाते हैं। किले की ऊंचाई से नीचे फैले जंगलों और घाटियों का दृश्य अत्यंत मनोहारी था। वहां खड़े होकर ऐसा लगता है जैसे समय रुक गया हो और इतिहास अपनी पूरी गरिमा के साथ हमारे सामने उपस्थित हो।

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सासाराम केवल ऐतिहासिक धरोहरों का नगर ही नहीं, बल्कि धार्मिक और प्राकृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां स्थित ताराचंडी मंदिर श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र है। पहाड़ियों के बीच स्थित यह मंदिर शांत वातावरण और आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण है। मंदिर परिसर में कुछ समय बिताने के बाद मन को अद्भुत शांति का अनुभव हुआ।

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यात्रा के दौरान मुझे स्थानीय बाजारों में घूमने का अवसर भी मिला। यहां के लोगों की सरलता और आत्मीयता मन को छू जाती है। दुकानदारों से बातचीत के दौरान मैंने महसूस किया कि सासाराम के लोग अपनी सांस्कृतिक विरासत पर गर्व करते हैं और आगंतुकों का स्वागत पूरे दिल से करते हैं। किसी भी यात्रा की पूर्णता स्थानीय भोजन के स्वाद के बिना संभव नहीं होती। सासाराम में भी बिहार की समृद्ध खाद्य संस्कृति का आनंद लेने का अवसर मिला। सुबह के नाश्ते में कचौड़ी-जलेबी और दिन में लिट्टी-चोखा का स्वाद अविस्मरणीय रहा। सत्तू से बने विभिन्न व्यंजन, चना घुघनी और स्थानीय मिठाइयों ने यात्रा को और भी स्वादिष्ट बना दिया। यहां के भोजन में सादगी है, लेकिन वही सादगी उसका सबसे बड़ा आकर्षण भी है।

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सासाराम में ठहरने की भी अच्छी व्यवस्था उपलब्ध है। यहां मध्यम बजट के होटल, गेस्ट हाउस और लॉज आसानी से मिल जाते हैं। मैंने शहर के केंद्र में स्थित एक होटल में ठहराव किया, जहां से प्रमुख पर्यटन स्थलों तक पहुंचना सुविधाजनक था। होटल की खिड़की से दिखाई देने वाला शहर का शांत दृश्य हर सुबह को विशेष बना देता था। शाम के समय जब सूर्य अस्त होने लगा और शेरशाह के मकबरे पर सुनहरी किरणें पड़ने लगीं, तब उसका सौंदर्य और भी अद्भुत हो गया। जलाशय में प्रतिबिंबित मकबरे की छवि किसी चित्रकार की उत्कृष्ट कृति जैसी प्रतीत हो रही थी। उस क्षण मुझे महसूस हुआ कि सासाराम केवल एक शहर नहीं, बल्कि इतिहास और प्रकृति का जीवंत संग्रहालय है।

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कुछ दिनों के प्रवास के बाद जब वापसी का समय आया, तो मन में संतोष और हल्की-सी उदासी दोनों थे। संतोष इसलिए कि मैंने भारत के इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को करीब से देखा था और उदासी इसलिए कि इस सुंदर नगर को छोड़ना पड़ रहा था।

दिल्ली लौटते समय ट्रेन की खिड़की से पीछे छूटते सासाराम को निहारते हुए मेरे मन में एक ही विचार था कि कुछ स्थान केवल देखे नहीं जाते, उन्हें महसूस किया जाता है। सासाराम भी ऐसा ही नगर है—जहां इतिहास पत्थरों में बोलता है, प्रकृति हरियाली में मुस्कुराती है और संस्कृति लोगों के व्यवहार में जीवित दिखाई देती है। यह यात्रा मेरे लिए केवल एक पर्यटन अनुभव नहीं थी, बल्कि भारत की गौरवशाली विरासत, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक चेतना को समझने का एक अनमोल अवसर थी। सासाराम की स्मृतियां आज भी मन में उसी तरह ताजा हैं, जैसे किसी पुराने लेकिन प्रिय गीत की मधुर धुन।

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