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Central Government’s Affidavit SC : केंद्र सरकार का सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा, कहा- तीन तलाक घातक

by Rakesh Pandey
Central Government's Affidavit SC
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नई दिल्ली : Central Government’s Affidavit SC : तीन तलाक को अपराध बनाने वाले 2019 के कानून का बचाव करते हुए केंद्र ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि यह प्रथा विवाह की सामाजिक संस्था के लिए घातक है। वहीं कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं के जवाब में दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से 2017 में इस प्रथा को खारिज करने के बावजूद, यह समुदाय के सदस्यों के बीच ‘इस प्रथा से तलाक की संख्या को कम करने में पर्याप्त निवारक के रूप में काम नहीं कर पाया है’।

इसमें कहा गया है कि संसद ने अपने विवेक से तीन तलाक से पीड़ित विवाहित मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए उक्त कानून पारित किया। वहीं हलफनामे में कहा गया है की यह कानून विवाहित मुस्लिम महिलाओं के लिए लैंगिक न्याय और लैंगिक समानता के व्यापक संवैधानिक लक्ष्यों को सुनिश्चित करने में मदद करता है। इसके साथा ही गैर-भेदभाव और सशक्तीकरण के उनके मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में मदद करता है।

मूल हलफनामा इस महीने की शुरुआत में समस्त केरल जमियथुल उलेमा द्वारा दायर किया गया था, जो खुद को प्रख्यात सुन्नी विद्वानों का एक संघ बताता है। वहीं याचिकाकर्ता ने मुस्लिम महिला अधिनियम, 2019 को असंवैधानिक बताया। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि अधिनियम मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, जिसमें वे अधिकार भी शामिल हैं जो भारतीय नागरिकों को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देते हैं और धर्म के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाते हैं।

 Central Government’s Affidavit SC : सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था

सुप्रीम कोर्ट ने 22 अगस्त 2017 को एक बार में कहकर दिए जाने वाले तीन तलाक तलाक-ए-बिद्दा को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। वहीं अदालत 23 अगस्त 2019 को मुस्लिम महिला अधिनियम, 2019 की वैधता का परीक्षण करने के लिए सहमत हो गई। इसके साथ ही कानून का उल्लंघन करने पर तीन साल तक की कैद हो सकती है।

 Central Government’s Affidavit SC : तीन तलाक कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं

दो मुस्लिम संगठनों जमीयत उलमा-ए-हिंद और समस्त केरल जमीयतुल उलेमा ने अदालत से कानून को असंवैधानिक घोषित करने का आग्रह किया है। वहीं जमीयत ने अपनी याचिका में दावा किया कि एक विशेष धर्म में तलाक के तरीके को अपराध घोषित करना, जबकि अन्य धर्मों में विवाह और तलाक के विषय को केवल नागरिक कानून के दायरे में रखना, भेदभाव को जन्म देता है, जो अनुच्छेद 15 की भावना के अनुरूप नहीं है।

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