Ranchi : वरिष्ठ आईएएस अधिकारी विनय चौबे और उनके करीबी रिश्तेदारों से जुड़े संदिग्ध वित्तीय लेनदेन अब जांच एजेंसियों की गहन पड़ताल के दायरे में हैं। पटना में आवासीय भवन निर्माण, फ्लैटों के आपसी हस्तांतरण और विदेश यात्राओं पर हुए भारी खर्च को लेकर एजेंसियां पैसों के स्रोत और भुगतान के दस्तावेज खंगाल रही हैं।

जांच में सामने आया है कि विनय चौबे के साले शिपिज त्रिवेदी ने पटना के पाटलिपुत्र इलाके में एक आवासीय परियोजना का निर्माण कराया। इस परियोजना के लिए अमीता रानी नामक महिला की जमीन पर वर्ष 2010 के बाद डेवलपर एग्रीमेंट किया गया, जिसमें जमीन मालिक और बिल्डर के बीच 50-50 प्रतिशत हिस्सेदारी तय हुई थी। इसके तहत ‘स्टेलर स्काईज़’ नामक आवासीय भवन का निर्माण कराया गया, जो तीन-चार वर्षों में पूरा हुआ।
भवन निर्माण पूरा होने के बाद इसी परियोजना से एक फ्लैट विनय चौबे के नाम किया गया। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, 22 अगस्त 2015 को सेल डीड संख्या 7713 के जरिए यह फ्लैट 42 लाख रुपये की कीमत दर्शाते हुए चौबे को हस्तांतरित किया गया। हालांकि, इस राशि का भुगतान किस माध्यम से हुआ, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख दस्तावेजों में नहीं है। इसी बिंदु को आधार बनाकर जांच एजेंसियां यह आशंका जता रही हैं कि फ्लैट वस्तुतः उपहार (गिफ्ट) के रूप में दिया गया हो सकता है।
जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि पटना में इस बहुमंजिला आवासीय भवन के निर्माण के लिए धन कहां से आया। अब तक न तो बिल्डर पक्ष और न ही अन्य संबंधित लोगों की ओर से धन स्रोत को लेकर संतोषजनक जवाब सामने आया है। इस कारण एजेंसियां यह संभावना भी टटोल रही हैं कि निर्माण कार्य में अवैध अथवा काले धन का इस्तेमाल किया गया हो।
इस प्रकरण से पहले की जांच में भी चौबे परिवार से जुड़े कई लेनदेन उजागर हो चुके हैं। एजेंसियों के अनुसार, ब्लेयर अपार्टमेंट की एक फ्लैट पहले विनय चौबे की पत्नी स्वप्ना संचिता के नाम पर खरीदी गई थी, जिसे बाद में उनके पिता को गिफ्ट कर दिया गया। इसी तरह दामाद द्वारा ससुर के नाम पर अशोक नगर में मकान खरीदे जाने का मामला भी जांच में सामने आया है।
इतना ही नहीं, जांच के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि चौबे की साली शिखा ने उनके परिवार की 10 से अधिक विदेश यात्राओं का खर्च वहन किया। इन यात्राओं पर करोड़ों रुपये खर्च होने का अनुमान है। बताया जाता है कि शिखा वर्तमान में अमेरिका में रहती हैं, जिससे वह भारतीय जांच एजेंसियों की प्रत्यक्ष पहुंच से बाहर हैं।
जांच एजेंसियां अब इन तमाम लेनदेन की कड़ियों को जोड़ते हुए यह पता लगाने में जुटी हैं कि आखिर इन सौदों और खर्चों के पीछे धन का वास्तविक स्रोत क्या था और इनमें किसी प्रकार की अनियमितता या अवैध आय का इस्तेमाल तो नहीं किया गया।

