
कंचन कुमार: आज जो लोग धर्म के नाम पर छोटी-छोटी बातों को लेकर आपस झगड़ा फसाद करते हैं, हिंसक रास्ता अपनाते हैं, उन्हें ईटखोरी का मां भद्रकाली मंदिर जरूर आना चाहिए। यहां शक्तिस्वरूपा मां भद्रकाली विराजमान हैं, भगवान बुद्ध के अनुयायियों को अजीब सी शांति मिलती है और जैन धर्मावलंबियों के लिए पावन उपासना का स्थल है, क्योंकि उनके 10वें तीर्थंकर शीतलनाथ स्वामी की यह (भदुली) जन्मभूमि है।

सब कुछ एक ही प्रांगण (परिसर) में। यह देश-दुनिया के अजूबा आध्यात्मिक स्थलों में से एक है, जहां तीनों धर्मों के लोग एक स्थान पर अपने-अपने ढंग से उपासना करते हैं, पूजा करते हैं और अपने अराध्य के होने की अनुभूति करते हैं। मां भद्रकाली में सनातनी मां काली का दर्शन करते हैं तो बौद्ध इनमें मां तारा का रूप देखते हैं।
भद्र स्वरूप में विराजमान हैं मां
झारखंड के ज्यादातर शक्ति के उपासना स्थलों पर बकरे की बलि देने की परंपरा है। लेकिन यहां ऐसा नहीं होता। हिंसक बलि वर्जित है। मां को नारियल की बलि चढ़ाई जाती है। इसके पीछे कई कारण हैं… मां भद्र स्वरूप में विराजमान हैं, वैष्णवी हैं और एक शायद यह भी कि बगल में अहिंसा के उपासक (जैन धर्म) के तीर्थंकर की जन्मस्थली है।
मां अपने बेटों को कभी नाराज नहीं करतीं। किसी की भावना आहत न हो, इसका पूरा ध्यान रखती है, ऐसे में अहिंसा के पुजारी वाले पुत्रों का भी ख्याल रखना नहीं भूलती।
यहां बहुत कुछ ऐसी चीजें सुनने-देखने को मिल जाएंगी जो और कहीं नहीं हैं।
सहस्त्रलिंगम शिवलिंग

मंदिर परिसर में सहस्त्रलिंगम शिवलिंग है। अपनी दुर्लभ बनावट के कारण यह देशभर में प्रसिद्ध है। इसका निर्माण एक ही काले पत्थर को तराश कर किया गया है, जिसमें 1008 छोटे शिवलिंग बने हैं। पुरातत्विदों के अनुसार यह सहस्त्रलिंगम शिवलिंग नौवीं शताब्दी काल में स्थापित किया गया था।
इसकी बनावट ऐसी है कि जब सहस्त्रलिंगम शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं तो यह स्वतः प्रवाहित होकर एक साथ 1008 शिवलिंगों को स्पर्श करता है। अर्थात एक लोटा जल से एक साथ 1008 शिवलिंगों का जलाभिषेक। स्थानीय लोग बताते हैं कि यह खुदाई में मिला था। इसके बाद इसे भद्रकाली मंदिर परिसर में विधिवत स्थापित किया गया।

खोने में पाने का सुख
इटखोरी ऐसी जगह है, जहां खोने में भी बहुत कुछ पाने का सुख छिपा होता है। इसे इसके नामाकरण से समझा जा सकता है। प्राचीन कथा के अनुसार, जब सिद्दार्थ (गौतम बुद्ध) ज्ञान प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या कर रहे थे, तब उनकी मौसी (प्रजापति गौतमी) उन्हें वापस ले जाने के लिए यहां आई थीं। लेकिन, वह बुद्ध की साधना और एकाग्रता को देखकर उन्हें तलाशने में असमर्थ रहीं।
निराश होकर बोलीं – ‘इति खोई’ (अर्थात: “मैंने उन्हें यहां खो दिया”)। इन्हीं शब्दों से इस स्थान का नाम ‘इटखोरी’ पड़ा। लेकिन हकीकत यह थी कि सिद्धार्थ के परिवारवालों ने उन्हें यहां खोया नहीं, बल्कि यहां से सिद्दार्थ को ऐसा रास्ता मिला जो बोध गया पहुंचाकर उन्हें भगवान बुद्ध बना दिया। अर्थात सिद्धार्थ को खोकर भगवान बुद्ध को पाया। आज भी मां के प्रंगण में पहुंचकर जो उनकी आराधना में कुछ क्षण के लिए भी खो जाता है, उसे अलौकिक सुख और शांति मिलती है।
प्राचीन अवशेष
मंदिर परिसर में एक बहुत प्राचीन स्तूप मौजूद है। यहा की खुदाई में भगवान बुद्ध की सैकड़ों मूर्तियां और बौद्ध स्तूप मिले हैं। इसके अलावा, जैन तीर्थंकर ‘शीतलनाथ’ के चरण-चिह्न भी मिले हैं, जो इस स्थान की धार्मिक महत्ता को दर्शाते हैं।
‘लाइट ऑफ एशिया’ ग्रंथ के अनुसार, बोधगया जाने के क्रम में भगवान बुद्ध ने इस क्षेत्र की यात्रा की थी और कुछ समय तक यहां रुके थे। यहां महाने नदी के तट पर बुद्ध विहार के प्राचीन चिह्न भी मौजूद हैं।
इटखोरी के मां भद्रकाली मंदिर परिसर और यहां स्थित पुरातात्विक अवशेषों का इतिहास 7वीं से 10वीं शताब्दी के बीच का माना जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों और शिलालेखों के अनुसार, इस प्राचीन मंदिर का निर्माण बंगाल के पाल राजवंश के राजा महेंद्रपाल देव के काल में कराया गया था।
पत्रकार एवं स्थानीय निवासी संजय शर्मा बताते हैं कि भारतीय पुरात्व विभाग ने यहां दो बार खुदाई कराई। एएसआई की रिपोर्ट के अनुसार खुदाई में 6ठी, 9वीं एवं 10वीं शताब्दी के अवशेष मिले हैं। खंडित प्रतिमाएं, बौद्ध स्तूप तथा जैन धर्म के 10वें तीर्थंकर शीतलनाथ स्वामी के चरणचिह्न मिले हैं।
9वीं 10वीं शताब्दी कालखंड में मां भद्रकाली मंदिर परिसर एक समृद्ध धार्मिक स्थल था। यहां के मठ मंदिर रेड सेंडस्टोन को तराश कर बनाए गए थे।
कब आना उचित
यूं तो यहां श्रद्धालु सालों भर मां के दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं। लेकिन, नवरात्र के मौके पर अधिक भीड़ होती है। वहीं शरद ऋतु में कालचक्र पूजा के समय काफी संख्या में बौद्ध धर्मावलंबी बोध गया आते हैं। वहां से बड़े संख्या में श्रद्धालु ईटखोरी भी पहुंचते हैं।
मास्टर प्लान पर काम होने से मिलेगी बड़ी पहचान
इस अनोखे तीर्थस्थल को पर्यटन केंद्र के रूप में ख्याति दिलाने के लिए पर्यटन विभाग द्वारा 500 करोड़ रुपये का मास्टर प्लान बनाया गया। लेकिन इसे इस पावन धरती पर नहीं उतारा जा सका है। प्लान अभी फाइलों में ही धूल फांक रही है।
1968 में मां भद्रकाली की प्रतिमा चोरी हो गई थी। चोरों से प्रतिमा की वापसी से क्षेत्र के लोगों में माता के प्रति आस्था और बढ़ गई। इसके बाद लोगों ने धीरे-धीरे मंदिर परिसर का विकास करना शुरू किया।
2015 में सरकार स्तर से इटखोरी महोत्सव की शुरुआत हुई। तब से मानों विकास में पंख लग गया।
तत्कालीन राज्य सरकार ने मंदिर परिसर में तीन करोड़ रुपये की लागत से डाक बंगला, ढाई करोड़ की लागत से विद्युत व्यवस्था कराई। वहीं साढ़े चार करोड़ की लागत से अत्याधुनिक म्यूजियम का निर्माण कराया जिसमें पुरातात्विक धरोहरों को संजोकर रखा गया है।
मास्टर प्लान के तहत मंदिर परिसर में 200 करोड़ रुपये की लागत से दुनिया का सबसे ऊंचा प्रेयर व्हील, मेगा प्लाजा गेट, आडिटोरियम, रिवर फ्रंट आदि का निर्माण कराने की योजना है।
कैसे पहुंचे ईटखोरी
इटखोरी पहुंचने के लिए सड़क मार्ग सबसे सुगम है। वैसे मां भद्रकाली मंदिर तक पहुंचने के लिए रेल, सड़क और हवाई मार्ग – तीनों विकल्प उपलब्ध हैं।
सड़क मार्ग से
इटखोरी रांची, हजारीबाग, गया और चतरा से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है।
• रांची से दूरी – लगभग 140–150 किमी
• हजारीबाग से दूरी – लगभग 65–70 किमी
• चतरा से दूरी – लगभग 35 किमी
• गया (बिहार) से दूरी – लगभग 90–100 किमी
रांची, हजारीबाग और गया से नियमित बस एवं टैक्सी सेवाएं उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग से
इटखोरी रेलवे स्टेशन नहीं है। निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन हैं:
• कोडरमा रेलवे स्टेशन – लगभग 80–90 किमी
• हजारीबाग टाउन स्टेशन – लगभग 70 किमी
• गया जंक्शन – लगभग 95 किमी
इन स्टेशनों से टैक्सी, बस या निजी वाहन द्वारा इटखोरी पहुंचा जा सकता है।
हवाई मार्ग से
निकटतम हवाई अड्डे:
• बिरसा मुंडा एयरपोर्ट, रांची – लगभग 150 किमी
• गया अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा – लगभग 100 किमी
एयरपोर्ट से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से इटखोरी पहुंचा जा सकता है।

