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Jamshedpur Bomb Blast : तेज धमाके के साथ ही कंट्रोल्ड ब्लास्ट से डिफ्यूज कर दिए गए अमेरिकी बम, जानें 80 साल दबे रहने के बाद भी क्यों जिंदा थे

ग्रामीणों का कहना है कि धमाका इतना तेज था कि जैसे एक लम्हे के लिए लगा धरती डोलने लगी। एक अन्य ग्रामीण का कहना है कि धमाका इतना तेज था कि लगा कान के पर्दे फट जाएंगे।

by Mujtaba Haider Rizvi
bahragoda bomb blast
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Jamshedpur : जमशेदपुर के बहरागोड़ा थाना क्षेत्र में उस वक्त सनसनी फैल गई, जब स्वर्णरेखा नदी के किनारे खुदाई के दौरान दो विशाल और बेहद खतरनाक बम बरामद हुए। इनमें से प्रत्येक बमों का वजन करीब 227 किलो है और चौंकाने वाली बात यह है कि ये पिछले 80 सालों से रेत में दफन होने के बावजूद आज भी जिंदा थे। सेना ने इन बमों को डिफ्यूज करने की प्रक्रिया बुधवार से शुरू कर दी थी।
इन बमों को डिफ्यूज कर दिया गया है। इसके लिए बड़े व्यापक इंतजाम किए गए थे। सेना ने आसपास के घरों को खाली करा दिया था। बहरागोड़ा के ग्रामीणों को अपने घरों से नहीं निकलने को कहा गया था। पुलिस बल भी तैनात कर दिए गए थे ताकि कोई भी व्यक्ति घटनास्थल की तरफ नहीं जा पाए। पूरा इलाका छावनी में तब्दील कर दिया गया थ। इसके बाद जब बमों को डिफ्यूज किया गया तो तेज धमाके हुए। ग्रामीणों का कहना है कि धमाका इतना तेज था कि जैसे एक लम्हे के लिए लगा धरती डोलने लगी। एक अन्य ग्रामीण का कहना है कि धमाका इतना तेज था कि लगा कान के पर्दे फट जाएंगे। इन बमों को कंट्रोल्ड ब्लास्ट के जरिए निष्क्रिय किया गया है।

बमों के मिलने की ये घटना बहरागोड़ा में पानीपड़ा-नागसुड़ाई इलाके की है, जहां मजदूर बालू खनन के लिए खुदाई कर रहे थे। इसी दौरान सात मार्च को जमीन के अंदर से सिलेंडरनुमा पहला बम निकला। बमों को देखते ही मौके पर अफरा-तफरी मच गई और तुरंत प्रशासन को सूचना दी गई।

जांच के लिए पहुंची सेना की टीम ने पुष्टि की कि ये बम बेहद शक्तिशाली हैं। इन पर ‘एएन-एम64’ और ‘मेड इन यूएसए’ अंकित है। विशेषज्ञों के मुताबिक, इनका इस्तेमाल द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किया जाता था। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि ये बम किसी पुराने सैन्य विमान से गिरकर यहां पहुंचे होंगे और समय के साथ रेत में दब गए।

हालांकि कुछ लोग इसे 2018 में कलाईकुंडा एयरबेस से उड़े ट्रेनर विमान के क्रैश से जोड़ रहे हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इतने पुराने बम उस हादसे से जुड़े नहीं हो सकते। इससे यह संभावना और मजबूत होती है कि इनका संबंध द्वितीय विश्व युद्ध काल से ही है।

कैसे किए गए डिफ्यूज?

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सेना की विशेष बम निरोधक टीम को दिल्ली से बुलाया गया था। 25 मार्च को इन बमों को निष्क्रिय करने की प्रक्रिया शुरू की गई। इसके लिए नदी किनारे करीब 100 मीटर गहरा गड्ढा खोदा गया , जिसमें बमों को रखकर नियंत्रित विस्फोट किया गया। सुरक्षा के मद्देनजर आसपास के 5 किलोमीटर क्षेत्र को खाली करा लिया गया था और गड्ढे को 500 से अधिक मिट्टी की बोरियों से कवर किया गया था।

दशकों बाद भी ‘जिंदा’ क्यों रहे बम?

विशेषज्ञों के अनुसार, ये बम कीचड़ और रेत में धीरे-धीरे दबते चले गए, जिससे इनमें विस्फोट नहीं हुआ। ऑक्सीजन की कमी और स्थिर वातावरण के कारण ये निष्क्रिय नहीं हुए, बल्कि अंदर ही अंदर सक्रिय बने रहे। यही वजह है कि दशकों बाद भी ये बम खतरा बने हुए थे। इस घटना ने अवैध बालू खनन और सुरक्षा मानकों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर समय रहते इन बमों का पता नहीं चलता, तो कोई बड़ा हादसा हो सकता था।

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