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Jamshedpur Muharram : या हुसैन की सदाओं के बीच साकची में इमामबाड़े से निकला मातमी जुलूस, जुलजनाह व अलम निकले 

Jamshedpur Muharram : किसी शायर ने कहा- गिरने ना दिया उसने शहर मशरेकैन को, खुद बैठ के जमीन पर उतारा हुसैन को।

by Mujtaba Haider Rizvi
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Jamshedpur : जमशेदपुर में मोहर्रम की 9 तारीख को साकची में हुसैनी मिशन के इमामबाड़े से मातमी जुलूस निकला। यह मातमी जुलूस स्ट्रेट माइल रोड होता हुआ साकची गोल चक्कर तक पहुंचा। जुलूस में नौहाखानी और सीनजनी हुई।

जुलूस में बच्चे अलम भी उठाए हुए थे। लोगों ने अलम पर फूल चढ़ाए और मन्नतें मांगी। जुलजनाह भी बरामद हुए।

इसके पहले इमामबाड़ा में मजलिस हुई। मजलिस को मौलाना जकी हैदर ने खिताब फरमाया।

मजलिस में मौलाना ने इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत को याद किया। उन्होंने बयान किया कि जब इमाम हुसैन मैदान में आए। ऐसी यादगार जंग की कि यजीदी फौजें भाग खड़ी हुईं। बाद में आसमान की से आवाज आई- नैजे पर नैजे खा चुके बस ऐ हुसैन बस, हम तुमको आजमा चुके बस ऐ हुसैन बस। सर को झुका दो खंजर ए बेदाद के लिए, कुछ इम्तिहान छोड़ दो सज्जाद के लिए।

इसके बाद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने अपनी तलवार म्यान में रखी। भागी हुई फौजें पलटीं। कोई तीर चला रहा था, कोई नैजा मार रहा था। कोई पत्थर चला रहा था। जिसके पास कुछ नहीं था वह सहरा की गर्म रेत इमाम हुसैन पर फेंक रहा था। हजरत मोहम्मद मुस्तफा सल्लल्लाहो अलैहे वआलेही वसल्लम का नवासा घोड़े पर नहीं ठहर सका। इमाम हुसैन घोड़े से ज़मीन पर तशरीफ लाए।

किसी शायर ने कहा- गिरने ना दिया उसने शहर मशरेकैन को, खुद बैठ के जमीन पर उतारा हुसैन को।

तारीख में लिखा है कि जुलजनाह, जो इमाम हुसैन का घोड़ा था, वह जमीन पर बैठ गया और इमाम जमीन पर आए। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के बदन पर इतने तीर थे कि उनका बदन जमीन पर नहीं, तीरों पर था।

शिम्र आगे बढ़ा और उसने नबी के नवासे का सार तन से जुदा कर दिया। मसायब सुनकर अजादार जारो कतार रोए। इसके बाद लम और जुलजनाह का जुलूस निकाला।

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