
Khunti : कभी गांवों की पहचान रहे कुम्हारों के चाक की आवाज अब धीरे-धीरे खामोश होती जा रही है। जिस मिट्टी को आकार देकर कारीगर दीये, घड़े, सुराही, गुल्लक और पूजा के बर्तन तैयार करते थे, उसी मिट्टी से उनका रिश्ता अब कमजोर पड़ रहा है। आधुनिक जीवनशैली, बाजार में बदलती पसंद और आर्थिक परेशानियों ने इस पुश्तैनी कारोबार के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। हालात ऐसे हैं कि पीढ़ियों से इस हुनर को संभालने वाले कारीगरों के बच्चे अब इस पेशे को अपनाने से कतरा रहे हैं।
झारखंड के खूंटी जिले में भी पारंपरिक मिट्टी शिल्प से जुड़े परिवारों की स्थिति चिंताजनक है। तोरपा कुम्हार टोली के रामाशीष महतो और कृष्णा महतो बताते हैं कि पहले मिट्टी के बर्तनों की मांग सालभर बनी रहती थी। दीपावली, शादी-विवाह और दूसरे धार्मिक आयोजनों में कुम्हारों के बनाए सामान की खूब बिक्री होती थी। लेकिन अब बाजार का स्वरूप बदल गया है। मिट्टी के उत्पादों की जगह प्लास्टिक, स्टील और दूसरे आधुनिक सामान ने ले ली है।
उनका कहना है कि कुम्हारों का चाक अब पहले की तरह नहीं घूमता। मेहनत लगातार बढ़ रही है, लेकिन आमदनी घटती जा रही है। ऐसे में परिवार चलाना और बच्चों की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो रहा है।
प्लास्टिक और बिजली की सजावट ने घटाई मिट्टी के दीयों की मांग
कुछ वर्ष पहले तक दीपावली पर घर-घर मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा थी। पूजा-पाठ से लेकर रोजमर्रा के इस्तेमाल तक मिट्टी के बर्तनों की अपनी अहमियत थी। अब बाजार में रंग-बिरंगी बिजली की झालरें, एलईडी लाइटें और आकर्षक सजावटी सामान आसानी से उपलब्ध हैं। प्लास्टिक और स्टील के उत्पाद भी लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं।
इसका सीधा असर स्थानीय कुम्हारों के कारोबार पर पड़ा है। एक तरफ तैयार सामान की बिक्री सीमित हो गई है, दूसरी तरफ कच्चे माल और उत्पादन की लागत लगातार बढ़ रही है। कारीगरों को उनकी मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिलती। कई बार कई दिनों की मेहनत के बाद तैयार सामान बेचने पर इतनी कम कमाई होती है कि परिवार का खर्च निकालना भी कठिन हो जाता है।
मिट्टी से लेकर भट्ठी तक हर कदम पर बढ़ा खर्च
खूंटी के पिपराटोली निवासी बुद्धू महतो बताते हैं कि मिट्टी के बर्तन बनाना अब पहले की तुलना में काफी मुश्किल हो गया है। अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी आसानी से नहीं मिलती। उसे दूर से लाने में परिवहन का खर्च उठाना पड़ता है। इसके अलावा बर्तनों को पकाने के लिए ईंधन और भट्ठी की व्यवस्था करना भी महंगा हो गया है।
मिट्टी के बर्तन तैयार करने की प्रक्रिया में काफी मेहनत लगती है। सबसे पहले मिट्टी को इकट्ठा कर साफ किया जाता है। फिर उसे गूंथकर चाक पर अलग-अलग आकार दिया जाता है। इसके बाद तैयार सामान को सुखाने और भट्ठी में पकाने की प्रक्रिया पूरी होती है।
इस काम में मौसम की भी बड़ी भूमिका होती है। बारिश और नमी के कारण बर्तन ठीक से नहीं सूख पाते। कई बार तैयार सामान खराब हो जाता है, जिससे कारीगरों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इतनी मेहनत के बावजूद बाजार में उचित कीमत नहीं मिलने से उनका उत्साह कम होता जा रहा है।
दीपावली के भरोसे चलता है कुम्हार परिवारों का कारोबार
कुम्हारों के लिए दीपावली सबसे बड़ा कारोबारी अवसर होता है। इस दौरान दीये, कलश और पूजा में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी के सामान की मांग बढ़ती है। लेकिन त्योहार के कुछ दिनों की कमाई से पूरे साल परिवार चलाना संभव नहीं है।
बुद्धू महतो के मुताबिक, बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और दूसरी जरूरतें पूरी करना लगातार चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। साल के बाकी दिनों में काम और बिक्री की स्थिति अनिश्चित रहती है। यही वजह है कि इस पेशे से जुड़े परिवार अब दूसरे रोजगार की तलाश करने लगे हैं।
बच्चों को नहीं दिख रहा पुश्तैनी हुनर में भविष्य
कुम्हारों के सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनकी अगली पीढ़ी इस कला को आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं है। बच्चे अपने माता-पिता को दिनभर मिट्टी गूंथते, चाक चलाते और बाजार में सामान बेचने के लिए संघर्ष करते देखते हैं। उन्हें लगता है कि इतनी मेहनत के बाद भी जब पर्याप्त आमदनी नहीं होती, तो इस पेशे में भविष्य सुरक्षित नहीं है।
इसलिए नई पीढ़ी पढ़ाई के बाद नौकरी और दूसरे व्यवसायों की ओर रुख कर रही है। कारीगरों का मानना है कि यदि इस काम में सम्मानजनक आमदनी और रोजगार की बेहतर संभावनाएं नहीं बनीं, तो आने वाले समय में पारंपरिक कुम्हार परिवारों की संख्या और घट सकती है।
सरकारी मदद और बाजार की व्यवस्था से बच सकती है पारंपरिक कला
कारीगरों की स्थिति सुधारने के लिए सरकारी स्तर पर ठोस पहल की जरूरत है। उन्हें सस्ती दर पर अच्छी मिट्टी, आधुनिक चाक, बेहतर भट्ठियां और तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाना चाहिए। साथ ही उनके उत्पादों की बिक्री के लिए स्थायी बाजार और उचित मूल्य सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
सरकारी मेलों, प्रदर्शनियों और स्थानीय बाजारों में कुम्हारों को विशेष स्थान दिया जा सकता है। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से उन्हें आर्थिक सहायता और बाजार से जोड़ने की व्यवस्था भी कारगर हो सकती है। आधुनिक डिजाइन और ग्राहकों की पसंद के अनुरूप उत्पाद बनाने का प्रशिक्षण मिलने से उनके कारोबार को नई दिशा मिल सकती है।
समाज की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। त्योहारों पर स्थानीय कारीगरों से मिट्टी के दीये और पारंपरिक सामान खरीदकर उनके कारोबार को सहारा दिया जा सकता है।
दरअसल, मिट्टी के बर्तन केवल इस्तेमाल की वस्तुएं नहीं, बल्कि हमारी लोकसंस्कृति और सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा हैं। दूसरों के घरों में रोशनी पहुंचाने वाले कुम्हारों के घरों में भी खुशहाली आनी चाहिए। इसके लिए उनके हुनर को सम्मान और मेहनत को उचित कीमत मिलना जरूरी है। समय रहते पहल नहीं हुई, तो कभी गांवों की पहचान रहा कुम्हारों का घूमता चाक इतिहास का हिस्सा बनकर रह सकता है।

