
रांची : जेपीएससी भर्ती घोटाले के मुख्य आरोपी मनोज कुमार तिवारी उर्फ अभय तिवारी की जमानत याचिका पर गुरुवार को सीआईडी के विशेष न्यायाधीश योगेश कुमार की अदालत में आंशिक सुनवाई हुई। अदालत ने अभियोजन पक्ष को जवाब दाखिल करने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई 11 अगस्त निर्धारित की है।
सीआईडी ने अभय तिवारी को 22 जुलाई को गिरफ्तार किया था। जांच में सामने आया है कि वह वर्तमान में गोड्डा के पोड़ैयाहाट में प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी था और इससे पहले नाम बदलकर जेपीएससी की परीक्षाएं संचालित करने वाली एजेंसी टीडीपीएल में मैनेजर के रूप में कार्यरत था। मामले में जेपीएससी की पूर्व उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता समेत 10 आरोपी पहले से न्यायिक हिरासत में हैं।
एसोसिएट प्रोफेसरों की नियुक्ति पर स्टेटस रिपोर्ट तलब
राज्य के विश्वविद्यालयों में एसोसिएट प्रोफेसरों की नियमित नियुक्ति से जुड़ी जनहित याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड लोक सेवा आयोग को स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 10 सितंबर निर्धारित की है।
सुनवाई के दौरान जेपीएससी ने अदालत को बताया कि झारखंड एलिजिबिलिटी टेस्ट (जेट)-2024 की परीक्षा हो चुकी है, लेकिन मॉडल आंसर-की पर प्राप्त आपत्तियों और कुछ तकनीकी व प्रक्रियागत कारणों से परिणाम अभी जारी नहीं हो सका है। जनहित याचिका में कहा गया है कि राज्य के विश्वविद्यालयों, विशेषकर रांची विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसरों और शिक्षकेतर कर्मचारियों के कई नियमित पद लंबे समय से रिक्त हैं तथा इन पर नियमित नियुक्ति के बजाय संविदा के आधार पर बहाली की जा रही है। याचिका में नियमित नियुक्ति प्रक्रिया शीघ्र पूरी कराने का निर्देश देने की मांग की गई है।
बंदोबस्ती रद्द करने का आदेश निरस्त
झारखंड हाईकोर्ट ने रांची के कांके अंचल में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के गरीब परिवारों को आवंटित सरकारी जमीन की बंदोबस्ती रद्द करने और उन्हें बेदखल करने के जिला प्रशासन के आदेश को निरस्त कर दिया है। जस्टिस एसके द्विवेदी की अदालत ने कहा कि यदि किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए जमीन की वास्तविक आवश्यकता भी हो, तब भी वहां करीब 35 वर्षों से रह रहे परिवारों को उचित मुआवजा दिए बिना बेदखल नहीं किया जा सकता। अदालत ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए रांची के उपायुक्त के पास भेज दिया।
मामले के अनुसार वर्ष 1990-91 में तत्कालीन सदर एसडीओ ने सरकारी दिशा-निर्देशों के तहत कांके मौजा की कैसरे-हिंद (सरकारी) भूमि एससी और एसटी वर्ग के गरीब परिवारों को आवंटित की थी। इसके बाद लाभुकों की जमाबंदी कायम हुई, वे नियमित रूप से लगान जमा करते रहे और जमीन पर मकान बनाकर परिवार सहित रहने लगे।
वर्ष 2001 में उपायुक्त ने यह कहते हुए बंदोबस्ती रद्द कर दी थी कि एसडीओ को कैसरे-हिंद भूमि आवंटित करने का अधिकार नहीं था। यह मामला पहले भी हाईकोर्ट पहुंचा, जहां खंडपीठ ने माना कि तत्कालीन सरकारी आदेशों के तहत एसडीओ को ऐसी जमीन आवंटित करने का अधिकार प्राप्त था। इसके बाद मामला पुनर्विचार के लिए उपायुक्त को भेजा गया।
पुनर्विचार के बाद 24 जनवरी 2014 को उपायुक्त ने फिर बंदोबस्ती रद्द कर दी। आदेश में कहा गया कि लाभुकों ने सलामी जमा नहीं की और भूमि सार्वजनिक उपयोग के लिए आवश्यक है। इसके बाद एलआरडीसी ने 18 फरवरी 2014 को बेदखली नोटिस जारी कर 5 मार्च 2014 तक जमीन खाली करने का निर्देश दिया। इन दोनों आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
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