चाईबासा : पश्चिमी सिंहभूम जिले में रविवार को ओड़िया समाज का पारंपरिक लोकपर्व रजो पूरे उत्साह, श्रद्धा और सांस्कृतिक उल्लास के साथ मनाया गया। पर्व के पहले दिन अहले सुबह से ही मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
नए परिधानों में की पूजा-अर्चना
महिलाओं, युवतियों और बच्चों ने नए परिधान धारण कर पूजा-अर्चना की तथा घर-परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की। पर्व के अवसर पर छोटी बच्चियां और कुंवारी कन्याएं हाथों में मेहंदी रचाकर पारंपरिक झूलों का आनंद लेती नजर आईं।
गांवों में लगे झूले, गूंजे लोकगीत
गांवों और बस्तियों में जगह-जगह झूले लगाए गए, जहां युवतियों ने लोकगीत बनस्ते डाकिला गजो, बरषके थरे आसिछी रोजो गाकर पर्व की खुशियां साझा कीं। पूरे क्षेत्र में ओड़िया संस्कृति और परंपरा की अनूठी छटा देखने को मिली।
घरों में बने पारंपरिक व्यंजन
रजो पर्व के दौरान घरों में चावल के आटे से बने विभिन्न पारंपरिक व्यंजन और पकवान तैयार किए गए। परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर इस लोकपर्व का आनंद लेते दिखे।
चार दिन तक चलता है उत्सव
हर वर्ष 14 जून को शुरू होने वाला यह चार दिवसीय उत्सव है, जिसमें पहले दिन पहली रजो, दूसरे दिन मिथुन संक्रांति, तीसरे दिन को भूदाहा या बासी रजो और चौथे दिन बसुमती या शुद्धिकरण स्नान के साथ पर्व का समापन होता है।
नारीत्व और धरती के सम्मान का प्रतीक
लोकमान्यता के अनुसार, रजो पर्व वर्षा ऋतु के आगमन का संदेश देता है और धरती माता तथा नारीत्व के सम्मान का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि यह पर्व केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि ओड़िया समाज की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का भी महत्वपूर्ण प्रतीक बनकर उभरता है।

