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Supreme Court ने झारखंड हाई कोर्ट से लंबित आपराधिक अपीलों पर रिपोर्ट मांगी, दिशानिर्देश जारी करने की योजना

सुप्रीम कोर्ट की यह पहल न्यायपालिका में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, जो न्यायिक प्रक्रिया में होनेवाले विलंब को कम करने और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है।

by Reeta Rai Sagar
Supreme Court
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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को झारखंड हाई कोर्ट में 67 आपराधिक अपीलों के लंबित रहने पर हैरानी जताई। इन सभी मामलों का निर्णय जनवरी 2022 से दिसंबर 2024 के बीच सुरक्षित किया गया था, लेकिन अब तक घोषित नहीं किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों से एक महीने के भीतर उन मामलों की रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है, जिनमें 31 जनवरी 2025 तक निर्णय सुरक्षित किया गया था लेकिन अब तक अंतिम निर्णय घोषित नहीं हुआ।

झारखंड हाई कोर्ट में लंबित आपराधिक अपीलें
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने झारखंड हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल की रिपोर्ट का संज्ञान लिया। इस रिपोर्ट के अनुसार डिवीजन बेंच में 56 आपराधिक अपीलें और सिंगल बेंच में 11 आपराधिक अपीलें जनवरी 2022 से दिसंबर 2024 के बीच सुरक्षित की गईं। अब तक निर्णय नहीं दिया गया। इस स्थिति को ‘चिंताजनक’ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों से 31 जनवरी 2025 तक सुरक्षित किए गए निर्णयों की स्थिति पर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है।

क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर उच्च न्यायालयों के लिए कुछ अनिवार्य दिशानिर्देश जारी करने की योजना बनाई है। इन दिशानिर्देशों में निर्णय सुरक्षित करने के बाद उसे निर्धारित समय सीमा के भीतर घोषित करने की प्रक्रिया को स्पष्ट किया जाएगा। साथ ही यदि किसी मामले में निर्णय में देरी होती है, तो संबंधित न्यायाधीश को इसकी जानकारी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को देनी होगी।

आजीवन कारावास के दोषियों की ओर से दायर की गई याचिका
यह आदेश चार आजीवन कारावास की सजा काट रहे दोषियों की याचिका पर आया है। इन सभी ने अपनी सजा में छूट के लिए झारखंड हाई कोर्ट में अपील की थी। उनका कहना है कि निर्णय में देरी के कारण वे छूट का लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भी झारखंड हाई कोर्ट से रिपोर्ट मांगी है।

न्यायिक प्रक्रिया में देरी से उठ रहे सवाल
न्यायिक देरी से न केवल न्याय की प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि यह न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिह्न लगाती है। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और समयबद्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट की यह पहल न्यायपालिका में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, जो न्यायिक देरी को कम करने और न्याय की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है।

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