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Jamshedpur News : आत्महत्या की रोकथाम के लिए संकट से पहले मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान जरूरी

रिश्तों, आर्थिक परेशानियों, काम और पढ़ाई के दबाव समेत कई कारक मिलकर बढ़ा सकते हैं मानसिक संकट : डॉ. हर्षिता बिस्वास

by Arvind Shrivastava
Jamshedpur News
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Jamshedpur : आत्महत्या आज दुनिया की गंभीर जन-स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल है। आत्महत्या के पीछे आमतौर पर कोई एक कारण नहीं होता, बल्कि जीवन में लगातार जमा होती छोटी-बड़ी परेशानियां, तनाव, अकेलापन, रिश्तों में संघर्ष, आर्थिक कठिनाइयां, काम या पढ़ाई का दबाव तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं व्यक्ति की स्थिति को गंभीर बना सकती हैं। ऐसे में आत्महत्या की रोकथाम के लिए संकट की स्थिति आने का इंतजार करने के बजाय मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक कल्याण पर पहले से ध्यान देना जरूरी है।

टाटा मेन हॉस्पिटल, जमशेदपुर के मनोचिकित्सा विभाग की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. हर्षिता बिस्वास के अनुसार, आत्महत्या के पीछे अक्सर कोई एक घटना नहीं होती। कई बार कोई तनावपूर्ण घटना केवल उस जटिल स्थिति का दिखाई देने वाला हिस्सा होती है, जो व्यक्ति के भीतर लंबे समय से बन रही होती है। लगातार बढ़ता तनाव धीरे-धीरे व्यक्ति की समस्याओं से निपटने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।

डॉ. बिस्वास के मुताबिक, दुनिया में हर वर्ष सात लाख से अधिक लोग आत्महत्या के कारण जान गंवाते हैं। भारत में भी आत्महत्या एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है। टाटा मेन हॉस्पिटल में हर वर्ष लगभग 100 से 120 मरीज आत्महत्या के प्रयास के बाद मनोचिकित्सा विभाग में परामर्श के लिए पहुंचते हैं। इन आंकड़ों के पीछे केवल संख्याएं नहीं, बल्कि व्यक्ति, परिवार और जीवन के उस कठिन दौर की कहानी होती है, जब परिस्थितियां असहनीय महसूस होने लगती हैं।

रोकथाम की शुरुआत संकट से पहले

विशेषज्ञ का कहना है कि आत्महत्या की रोकथाम का कोई एक समाधान नहीं है। समय पर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता, उचित हस्तक्षेप, परिवार और कार्यस्थल का सहयोगी वातावरण तथा मदद लेने से जुड़ी झिझक को कम करना महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही रोजमर्रा के तनाव और कठिन परिस्थितियों से स्वस्थ तरीके से निपटने की क्षमता विकसित करना भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को केवल बीमारी की स्थिति में याद करने के बजाय भावनात्मक कल्याण को जीवन का नियमित हिस्सा बनाया जाना चाहिए। व्यक्ति को अपनी भावनाओं को पहचानने, तनाव के कारणों को समझने और जरूरत पड़ने पर भरोसेमंद लोगों से बात करने की आदत विकसित करनी चाहिए।

आत्म-मूल्य को किसी एक सफलता से न जोड़ें

डॉ. बिस्वास के अनुसार, व्यक्ति को अपने आत्म-मूल्य को किसी एक रिश्ते, नौकरी, परीक्षा, उपलब्धि या सफलता की परिभाषा से नहीं जोड़ना चाहिए। जीवन में अर्थ और संतुष्टि के कई स्रोत होने से किसी एक क्षेत्र में कठिनाई आने पर व्यक्ति के पास संभलने के दूसरे सहारे मौजूद रहते हैं।

परिवार और रिश्तों के अलावा काम, रचनात्मकता, सीखना, प्रकृति, दूसरों की सेवा और आध्यात्मिकता भी जीवन में उद्देश्य और संतुष्टि का आधार बन सकते हैं। आस्था और प्रार्थना कठिन समय में व्यापक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद कर सकती हैं, हालांकि जरूरत पड़ने पर ये पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य सहायता का विकल्प नहीं हैं।

स्वीकार करना और कृतज्ञता भी महत्वपूर्ण

विशेषज्ञ के मुताबिक, मानसिक मजबूती की प्रक्रिया में परिस्थितियों को स्वीकार करना भी महत्वपूर्ण है। स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति असफलता या नुकसान को सही मान ले, बल्कि यह समझना है कि कुछ घटनाएं जीवन का हिस्सा हैं और उन्हें बदलना संभव नहीं होता। ऐसे समय में व्यक्ति को यह सोचने की जरूरत है कि “अब मैं क्या कर सकता/सकती हूं?”

कृतज्ञता का अभ्यास भी भावनात्मक कल्याण में मदद कर सकता है। इसका अर्थ समस्याओं को नजरअंदाज करना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों के बीच मौजूद सकारात्मक और अर्थपूर्ण क्षणों को पहचानना है।

रोजमर्रा की जिंदगी में अपनाएं ये आदतें

विशेषज्ञ ने मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने के लिए नियमित रूप से स्वयं से संवाद करने, तनाव के वास्तविक कारणों को पहचानने और हालात बिगड़ने से पहले किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करने की सलाह दी है।

नियमित नींद, शारीरिक गतिविधि, पौष्टिक भोजन और पर्याप्त आराम को भी तनाव से निपटने की क्षमता के लिए जरूरी बताया गया है। साथ ही परीक्षा में असफलता, नौकरी छूटने या रिश्ते के टूटने जैसी किसी एक घटना को अपनी पूरी पहचान नहीं बनने देना चाहिए।

जीवन में ऐसी गतिविधियों के लिए भी समय निकालना जरूरी है, जो व्यक्ति को उद्देश्य, संतुष्टि या खुशी का अनुभव कराएं। छोटी-छोटी अच्छी घटनाओं के प्रति कृतज्ञता का अभ्यास भी भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकता है।

आत्महत्या के विचारों को कभी नजरअंदाज न करें

डॉ. बिस्वास ने कहा कि लगातार निराशा, लोगों से दूरी बनाना, अत्यधिक मानसिक परेशानी या आत्महत्या के विचारों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को अकेले इससे जूझने के बजाय जल्द से जल्द मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि उदासी, चिंता, निराशा या तनाव का असर रोजमर्रा की जिंदगी, रिश्तों, नींद अथवा काम पर पड़ने लगे, तो पेशेवर सहायता लेने में देरी नहीं करनी चाहिए। मृत्यु, खुद को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या से जुड़े विचारों को हमेशा गंभीर संकेत के रूप में लेना चाहिए।डॉ. बिस्वास के अनुसार, जीवन की हर चुनौती को खत्म करना संभव नहीं है और वेलनेस हर संकट को रोकने की गारंटी भी नहीं देती। लेकिन सार्थक रिश्ते, तनाव से निपटने के स्वस्थ तरीके, जीवन में उद्देश्य और व्यापक दृष्टिकोण व्यक्ति की आंतरिक क्षमता को मजबूत कर सकते हैं।

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