
हजारीबाग : झारखंड के हजारीबाग स्थित विनोबा भावे विश्वविद्यालय और उसके अंगीभूत महाविद्यालयों में गैर शैक्षणिक कर्मचारियों की कमी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कुल 378 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 66 कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि 312 पद खाली पड़े हैं। यानी करीब 83 प्रतिशत पद रिक्त हैं। सीमित कर्मचारियों के सहारे कार्यालयों और प्रशासनिक कामकाज का संचालन करना पड़ रहा है।
विश्वविद्यालय में शिक्षकों की कमी के साथ गैर शैक्षणिक कर्मियों का अभाव भी चिंता का विषय है। नियमित नियुक्तियों का लंबा इंतजार और वर्षों से अटकी प्रोन्नति, दोनों समस्याएं कर्मचारियों तथा संस्थान की कार्यव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं।
1998 के बाद नहीं हुई नियमित बहाली
गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों की अंतिम नियमित नियुक्ति वर्ष 1998 में हुई थी। इसके बाद नियमित बहाली नहीं होने से रिक्त पदों की समस्या बनी हुई है। लगभग तीन दशक के इस अंतराल ने उपलब्ध कर्मचारियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियों का दबाव बढ़ाया है।
भर्ती प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ने के पीछे झारखंड सरकार के स्तर पर रोस्टर क्लीयरेंस नहीं मिलना प्रमुख अड़चन बताया जा रहा है। ऐसे में खाली पद होने के बावजूद नियमित नियुक्तियों का रास्ता फिलहाल स्पष्ट नहीं दिख रहा है।
दैनिक वेतनभोगी कर्मियों से संभल रहा काम
कर्मचारियों की कमी दूर करने के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन वैकल्पिक व्यवस्था का सहारा ले रहा है। दैनिक वेतन पर कार्यरत कंप्यूटर ऑपरेटरों और अन्य कर्मियों से विभिन्न कार्यालयी जिम्मेदारियां पूरी कराई जा रही हैं। समय-समय पर अनुकंपा के आधार पर भी नियुक्तियां हुई हैं।
इन व्यवस्थाओं से कामकाज जारी है, लेकिन स्वीकृत पदों के मुकाबले नियमित कर्मियों की संख्या बेहद कम है। विश्वविद्यालय और अंगीभूत महाविद्यालयों के लिपिकीय तथा प्रशासनिक कार्यों का बड़ा हिस्सा इसी सीमित मानव संसाधन और वैकल्पिक सहयोग पर निर्भर है।
बहाली के साथ प्रोन्नति भी वर्षों से लंबित
समस्या केवल नई नियुक्तियों तक सीमित नहीं है। वर्ष 1998 में नियुक्त कर्मचारियों को अब तक नियमित प्रोन्नति का लाभ नहीं मिल सका है। लंबे इंतजार से कर्मियों के बीच निराशा बनी हुई है।
वर्ष 2019 में प्रोन्नति की प्रक्रिया आगे बढ़ने पर उम्मीद जगी थी। संबंधित कर्मचारियों ने लिखित परीक्षा भी दी थी। हालांकि, इसके बाद कोविड-19 महामारी शुरू होने से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी। महामारी का दौर बीतने के कई वर्षों बाद भी मामला लंबित बना हुआ है।
कुलपति की नियुक्ति से फिर जगी उम्मीद
पिछले कुछ वर्षों में पूर्णकालिक कुलपति की स्थिति स्पष्ट नहीं रहने का असर प्रोन्नति समेत कई प्रशासनिक मामलों पर पड़ने की बात भी सामने आई है। प्रो. चंद्र भूषण शर्मा के कुलपति नियुक्त होने के बाद कर्मचारियों में लंबित प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद बनी है।
अब कर्मियों की नजर विश्वविद्यालय प्रशासन की अगली पहल पर है। रोस्टर संबंधी बाधा दूर करने, नियमित बहाली की दिशा में कदम उठाने और प्रोन्नति प्रक्रिया आगे बढ़ाने से कर्मचारियों को राहत मिलने के साथ प्रशासनिक व्यवस्था को भी मजबूती मिल सकती है।

