दो दिनों से लगातार बारिश होने के कारण मोहल्ले की टूटी सड़कों पर पानी भर आया था। लोगों ने उस पर ईंट रखकर आने-जाने का रास्ता बना लिया था। आज भी सुबह से रिमझिम-रिमझिम बारिश हो रही थी, लोग जरुरी काम से ही बाहर निकल रहे हैं, लेकिन मंगरू की दिनचर्या में कोई परिवर्तन नहीं आया है,वह सिर पर एक प्लास्टिक ओढ़े, एक गमछा कमर पर और एक गमछा बदन पर लपेटे हुए सब्ज्जियों के पौधों के बीच घुसकर सब्जियां तोड़ रहा था। सुबह से वह चार टोकरी नेनुआ और तीन टोकरी कुंदरू निकाल चुका है। अब बैंगन तोड़ रहा था। तभी पड़ोस की वर्मा चाची हाथ में झोला लिए आईं और मंगरू के टीन के दरवाजे को पीटते हुए बोलीं –
मंगरू, ओ मंगरू दरवाजा खोल! अरे खोल ना दरवाजा, थोड़ा नेनुआ दे दे, इस पानी में बाजार जाने का मन नहीं हो रहा है, खोल ना रे! तब तक वहां सिंह चाची भी आ पहुँची और कहने लगीं- अरे मंगरुआ खोल रे… कुछ सब्जी दे दे… खोल ना रे! मंगरू ने उधर से गुस्से में चिल्ला कर कहा- नहीं खोलेगा,नहीं खोलेगा साला.. तुमलोग को सब्जी नहीं देगा,सब सब्जी मेरा मालिक का है,तुमलोग जाओ यहाँ से। सिंह चाची भी चिल्ला कर बोलीं- अरे चिल्ला काहे को रहा है!बाजार भाव से चार पैसा ज्यादा ले लेना – बोला ना नहीं देगातो नहीं देगा- मंगरू उसी तरह चिल्लाकर बोला वर्मा चाची, सिंह चाची से बोलीं- चलिए जी, मंगरुआ बड़ा स्वामिभक्त है, वह हमलोगों को सब्जी नहीं देगा।
मंगरू की उम्र पैंतालीस से पचास की रही होगी लेकिन कड़ी मेहनत और अभाव ने उसे साठ का बना दिया था, पूरे शरीर पर एक पाव माँस भी अतिरिक्त नहीं था। झुकी कमर, आंखों पर गोल-गोल चश्मा, जिसे वह धागों के सहारे कानों में फँसा लेता और गुस्सा नाक की नोंक पर-ऐसा ही था मंगरू।
बात 1980 की है, राम प्रसाद शर्मा की आठ कट्ठा जमीन मोहल्ले के बीच में खाली पड़ी थी। उन्होंने सोचा कि क्यों न इसमें सब्जी उगाई जाए, जिससे घर में खाने के लिए ताजी सब्जी भी मिल जाएगी और कुछ अतिरिक्त आमदनी भी हो जाएगी। उन्होंने जमीन को ऊँची चारदीवारी देकर घेरवा दिया और वहाँ एक कमरा बनवा दिया था। किसी ने शर्मा जी को बताया था कि जमशेदपुर से सटे ‘सारडा’ एकआदिवासियों का गाँव है, जहाँ के युवक बेरोजगार हैं और काम की तलाश में हैं। शर्मा जी सारडा गाँव गए और वहाँ उनकी भेंट मंगरू से हुई, वे मंगरु को अपने साथ ले आए और तब से आज पैंतालीस वर्ष हो गए, मंगरू वहीं रह रहा है। साल में एक बार वह टुसू–पर्व में अपने गाँव जाता था, लेकिन जब से उसकी घरवाली का स्वर्गवास हो गया, उसने गाँव जाना भी छोड़ दिया था, बस सारा दिन अपने खेतों में ही उलझा रहता, कभी उन्हें कोड़ता, कभी सींचता, कभी घंटों निहारता, तो कभी पौधों को पुचकारता, सहलाता, उसकी समस्त दुनिया उन खेतों में ही समाहित थी।
समय बीतता गया, चालीस वर्षों में काफी कुछ बदल गया,लोगों की मानसिकताएं बदलने लगीं, पैसे की अहमियत अब ज्यादा मायने रखने लगी। राम प्रसाद शर्मा भी इससे अछूते नहीं रहे। उन्होंने अपनी वो आठ कट्ठा जमीन बिल्डर को बेच दी, उन्हें लगा इससे उन्हें ज्यादा फायदा होगा।
सुबह के दस बज रहे थे। उस टीन के दरवाजे की कुण्डी बस एक ही बार बजी थी और मंगरू खेत के कोने से दौड़ा-दौड़ा आया, वह समझ गया कि उसके मालिक आए हैं, लेकिन इस बार उसके मालिक अकेले नहीं, बल्कि चार लोगों के साथ आए थे। मंगरू उन्हें देखते ही कहने लगा-
मालिक देखिए कितना सब्जी निकला है- हमको मालूम था कि आप आएगा, इसलिए हम पहले ही सब्जी निकाल दिया- शर्मा जी ने कहा- हाँ वो तो ठीक है, लेकिन अब कुछ लगाने की जरुरत नहीं है, अब ये सब काम छोड़ दो- मंगरू ने सहमते हुए धीरे से पूछा- काहे मालिक, हमसे कवनो गलती हो गया का?
– अरे नहीं रे मंगरू, बस बहुत कर लियाहै ये काम,अब चल कर मेरे घर पर पड़े रहना, दस-बारह गमला है उसी को कोड़ते रहना और लोगों को चाय-पानी पहुँचाना। मंगरू कुछ समझा नहीं।
कुछ ही दिनों के बाद एक दिन बिल्डर बुलडोजर के साथ वहाँ पहुँच गया, साथ में शर्मा जी भी थे। शर्मा जी ने मंगरू से कहा- चल मंगरू अपना सामान बाँध ले और चल मेरे साथ। नहीं मालिक हम कहीं नहीं जाएगा, हम यहीं रहेगा- मंगरू ने अपनी इच्छा जाहिर करते हुए कहा कि अरे मंगरू चल, मेरे घर पर पड़े रहना- शर्मा जी ने फिर कहा कि नहीं मालिक- मंगरू ने भी फिर वही बात दोहराई -शर्मा जी ने फिर उसे समझाते हुए कहा –देख मंगरू अब इस जमीन पर घर बनेगा, तो तुम यहाँ कैसे रहोगे? चलो सामान बाँध लो।
मंगरू ने शर्मा जी को बेबस भरी आखों से देखा- मानो, कह रहा हो- मालिक आपके पास रहने के लिए एक बड़ा मकान तो है ही, फिर आप यहाँ मकान बनवाना क्यों चाहते हैं? और वह धीरे-धीरे एक मोटरी में अपना सामान बाँधने लगा, तभी बुलडोजर की तेज आवाज ने उसे चौंका दिया, बुलडोजर ने उसकी चारदीवारी गिरा दी थी, वह अपनी मोटरी छोड़ उस ओर भागा और अपने को रोक न पाया,
– ऐ.. ऐ.. क्या करता है.. रोको.. रोको.. मालिक रोकिए इन लोग को.. उसने एक पत्थर उठाते हुए गुस्से में कहा-
– साला हम तुमलोग को छोड़ेगा नहीं.. फिर दौड़कर शर्मा जी के पास गया और चिल्लाकर कहने लगा- मालिक रोकिए, रोकिए
– शर्मा जी ने सहानुभूति जताते हुए कहा- काहे चिल्लाता है रे मंगरू, चल जा, जाके गाड़ी में बैठ जा
तब तक दूसरी तरफ की दीवार भी ढह चुकी थी। आंखों के सामने अपने पौधों को कुचलते देख लाचार मंगरू के आंसू छुप न सके, चश्मे के नीचे से उतरकर उसके पिचके गालों पर ठहर गए थे। उसकी नजरें अपने कुचले पौधों पर ही गड़ी रहीं, वह एक बुत बनकर वहीं खड़ा रहा, कहीं शून्य में ताक रहा था। शर्मा जी ने उसके करीब आकर जोर से आवाज लगाई – मंगरू, ऐ मंगरू चल अपनी मोटरी उठा और गाड़ी में जाकर बैठ, मंगरू ने अपनी मोटरी उठाई और जाकर गाड़ी में बैठ गया।
मंगरू अपने मालिक के घर पहुँच चुका था, वह उसी तरह शून्य में ताक रहा था। शर्मा जी की पत्नी उसे आँगन के एक कमरे में ले गई, उस कमरे के एक तरफ के हिस्से में घर की कुछ फालतू चीजें पड़ीं थीं और एक तरफ का हिस्सा खाली पड़ा था। वहीं उन्होंने मंगरू से कहा कि वह अपना सामान रख दे। कुछ ही देर में शर्मा जी की पत्नी थाली में मंगरू के लिए खाना लेकर आई और बोली- ले मंगरू इसे खा ले और सो जा, लेकिन मंगरू को देखकर ऐसा लगा मानो उसने कुछ सुना ही न हो।
सुबह शर्मा जी की पत्नी ने मंगरू को चाय लेने के लिए बहुत बार आवाज लगाई, लेकिन उधर से कोई जवाब न आने पर वह स्वयं चाय लेकर मंगरू के पास गई, उन्होंने देखा कि पीछे का दरवाजा खुला है और न मंगरू वहाँ है और न ही उसकी मोटरी।
मंगरू का मन बेचैन था, वह सुबह होते ही अपने पौधों को देखने वहाँ भागा, लेकिन उसके खेत पर उसके पौधों का कहीं नामोंनिशान नहीं था, बल्कि उसका एक कमरे का घर.. इन चालीस वर्षों में जिसे उसने अपने आप को उसका मालिक मान बैठने की भूल कर ली थी, वह भी ढहचुकाहै। इस घटना को हुए आज चार वर्ष बीत गए। राम प्रसाद शर्मा के उस जमीन पर एक आलीशान, खूबसूरत फ्लैट-काम्प्लेक्स बनकर तैयार हो गया है,लोग उसमें रहने भी लगे हैं, महंगी-महंगी गाड़ियाँ सामने लगी रहतीं हैं, लेकिन उसी फ्लैट-काम्प्लेक्स की मोड़ पर एक कोने में मंगरू दुबका बैठा रहता है। एक झोले में दिन भर पत्थर इकठ्ठा करता है और बुदबुदाता रहता है-
– साला रात में जब सब सो जाएगा तब हम पत्थर से इस बिल्डिंग को गिरा देगा.. बच्चे उसे छेड़ते हैं- क्या रे मंगरु… तुम पत्थर से बिल्डिंग गिराएगा! गिरा कर दिखाओ तो- हा-हा-मंगरु पगला गया है, कहता है पत्थर से बिल्डिंग गिराएगा हा-हा- हा…


