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Chaibasa News : अंतर्जातीय विवाह को हो समाज में मान्यता नहीं, वार्षिक अधिवेशन में किया गया ऐलान

Chaibasa News : आदिवासी हो समाज महासभा का दो दिवसीय सालाना अधिवेशन की हुई शुरुआत

by Rajeshwar Pandey
Annual convention in Chaibasa discussing decision on non-acceptance of intercaste marriage
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Chaibasa : आदिवासी हो समाज महासभा का दो दिवसीय वार्षिक अधिवेशन 2026 की आदिवासी कल्याण केंद्र किरीबुरु में रविवार को दियूरी धनुर्जय लागुरी के बोंगा बुरु के साथ शुरुआत हुई।

इसके बाद आदिवासी हो समाज महासभा का झंडा फहराया गया। कार्यक्रम हो समाज की सामूहिक प्रार्थना (गोवारी) के साथ आरंभ हुआ। इसके बाद कार्यक्रम की शुरुआत आदिवासी कल्याण केंद्र के अध्यक्ष हीरालाल सुंडी और करमपदा मुंडा राजेश मुंडा ने सामूहिक रूप से की। इस मौके पर प्रतिनिधि सभा के सदस्यों के बीच चर्चा-परिचर्चा की शुरुआत हुई। इसमें महासभा की ओर से “केया- केपेया आंदी (जिसे हम हिंदी में भाग कर शादी करना भी कहते हैं) की सामाजिक प्रक्रिया के बारे विस्तार से चर्चा हुई।

अलग अलग समूह में प्रतिनिधियों ने इससे संबंधित परंपराओं की बात की। साथ में यह भी निर्णय हुआ कि बाला के रूप में लोग लड़की के घर आते हैं, फिर लड़के के यहां आते हैं और इस दौरान वहां शादी कर दी जा रही है, जो हो समाज की परंपरा के अनुसार बिल्कुल गलत है। क्योंकि हो समाज में लड़की के यहां बाला के अनुष्ठान में लड़का नहीं जाता है। इसी तरह लड़के के यहां बाला में लड़की नहीं जाती है। ऐसे में बाला में शादी की प्रक्रिया को महासभा की प्रतिनिधि सभा ने अमान्य करार किया। इसे हो समाज के लोग संयम से समझें। अपनी परंपरा को अपनी सुविधा के अनुसार ना बदलें, अन्यथा आने वाले समय में अपनी परंपरा की शुद्धता के लिए समाज को संघर्ष करना पड़ेगा। मूल सामाजिक दस्तूर और परंपरा धीरे-धीरे विलुप्त व नष्ट हो जाएगी।

दूसरा महत्वपूर्ण निर्णय यह हुआ कि भाग कर शादी करने की प्रथा मान्य होगी, लेकिन घर के आंगन में ससंग-सुनुम और आदिंग-हेबे आदेर की प्रक्रिया को पूर्ण करना होगा। इसके पश्चात् अजिहनर के रूप में जब लड़की वाले लोग लड़के के यहां आयेंगे, तो उसी में बाला संपन्न होगा।

आदिवासी हो समाज में मारंग बोंगा, के रूप में प्रत्येक टाइटल यानी गोत्र का अपना इतिहास होता है। गोत्र के कुर्सीनामा को आदिवासी हो समाज में मारंग बोंगा के रूप में सम्मान दिया जाता है। कई गोत्रों में मारंग बोंगा की संस्कृति विलुप्त होने के कगार पर पहुंची हुई है। जबकि, इस अनुष्ठान में किली या गोत्र के माइग्रेशन या प्रवास के पूरे इतिहास को याद किया जाता है। मारंग बोंगा को पुनर्जीवित करने के लिए सभी गोत्रों से इस पूजा पाठ से संबंधित विधान को महासभा की ओर से आमंत्रित किया गया है।

महासभा के अध्यक्ष मुकेश बिरुवा ने बिरुवा कीली के मारंग बोंगा के बारे विस्तार से जानकारी देते हुए बिरुवा किली के मारंग बोंगा के बारे‌ में बताया कि बिरुवा कीली के लोग अभी तक 84 गांव में रहते हैं और गेरू नगर व चोंपा नगर से आकर चितिरबिला, सोगोड़कटा, नोगोड़ो, सिंदूरीगुयू, टेंगराहातु, कुंद्रुगुटु होते हुए एक समूह कोकचो के बगल दरां, तुइबासा, टोंटो पुखरिया तरफ, तो दूसरा ग्रुप तोरो, भरभरिया, लगड़ा की तरफ बसे हैं। एक समूह घाटी के ऊपर में हाटगम्हारिया और मझगांव क्षेत्र में भी बस गए।

मारंग बोंगा के इस विशेष पूजा के बारे बताते हुए यह बताया गया कि मारंग बोंगा ही किली के प्रवास या माइग्रेशन का पारंपरिक इतिहास है। उसे पूरे हो समाज में जीवित करने के लिए सभी क़िली के लोगों से महासभा ने आह्वान किया कि अपने-अपने मारंग बोंगा के इतिहास को महासभा के यहां जमा करें, ताकि पूरे ‘हो’ जाति के पारंपरिक इतिहास को संजोय रखने के प्रयास को स्थापित किया जा सके। इस बार सिर्फ बिरुवा क़िली का मारंग बोंगा महासभा के पास जमा किया गया।

अंतर्जातीय विवाह को हो समाज में मान्यता नहीं मिलेगी। इसके संबध में तय हुआ कि अंतर्जातीय विवाह को किसी भी पारंपरिक पूजा-पाठ एवं घर के आदिंग में स्थान नहीं मिलेगा।

रिंग सेरेमनी भी आदिवासी हो समाज के शादी का पारंपरिक विधान नहीं है। इसीलिए ऐसे आयोजन से ‘हो’ समाज के लोग बचें, ऐसा फैसला भी इस अधिवेशन में आए प्रतिनिधियों द्वारा लिया गया। सभा में मुख्य रूप से सोमा कोड़ा, चैतन्य कुंकल, बामिया बारी, छोटेलाल तामसोय, माधव चन्द्र कोड़ा, रोया राम चंपिया, गोपी लागुरी, रमेश लागुरी, बलभद्र बिरुली, श्याम बिरुवा, अमर बिरुवा, जयराम पाट पिंगुवा,भूषण लागुरी, पुतकर लगूरी, अमरसिंह सुंडी, नीलिमा पुरती, गीता लगुरी, पदमुनि लागुरी आदि काफ़ी संख्या में और समाज के प्रतिनिधिगण शामिल हुए।

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