जमशेदपुर : आदिवासियों का परंपरागत शिकार पर्व सेंदरा सोमवार को सुबह से शाम तक मनाया गया। इस दौरान ग्रामीणों ने पूर्वी सिंहभूम जिले के बोड़ाम में हिरण का शिकार किया। इस पर्व को मनाने के लिए पूरे राज्य के विभिन्न जिलों के अलावा पश्चिम बंगाल और ओडिशा से भी आदिवासी समुदाय के सैकड़ों लोग पारंपरिक हथियारों से लैस होकर आए थे। वे सुबह 6 बजे से दलमा की पहाड़ियों पर चढ़े और शाम को शिकार की परंपरा निभाकर लौट आए। बोड़ाम क्षेत्र में कुछ दलों ने एक हिरण व कुछ खरगोश का शिकार किया। शिकार के बाद जंगली जानवरों को ग्रामीण अपने साथ ले गए।

इधर, वन विभाग भी पूरी तरह सतर्क रहा। आरसीसीएफ स्मिता पंकज और दलमा डीएफओ सबा आलम अंसारी सहित कई अधिकारी दिनभर क्षेत्र में मौजूद रहे और लगातार गश्ती की गई। सभी अधिकारी करीब दलमा टॉप से इसकी निगरानी करते नजर आए। वहीं वन विभाग की टीम दलमा के अलग अलग हिस्सों में पेट्रोलिंग करती नजर आयी और उन्होंने शिकारियों को समझाकर वापस भेजने का प्रयास किया। पिछले सालों के मुकाबले इस बार बहुत हद तक शिकार रोकने में कामयाब नजर आया।
दलमा में दिखी सदियों पुरानी संस्कृति
दलमा वन्यजीव अभयारण्य में सेंदरा पर्व के दौरान दिनभर शिकार की परंपरा निभाने के बाद शिकारी दोपहर तीन बजे के बाद पहाड़ से उतरने लगे थे। शाम तक सभी दल तराई क्षेत्र फदलोगोड़ा में एकत्र हुए, जहां लो-वीर दरबार (महापंचायत) का आयोजन किया गया। इस दौरान पारंपरिक सिंगराई नृत्य प्रस्तुत किया गया, जिससे माहौल पूरी तरह सांस्कृतिक रंग में रंग गया। दरबार में दलमा राजा राकेश हेंब्रम ने युवाओं को संबोधित करते हुए पारिवारिक जीवन के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने समाज के सर्वांगीण विकास, पारंपरिक व्यवस्था को सशक्त बनाए रखने और जल, जंगल, जमीन की रक्षा करते हुए संस्कृति व पर्व-त्योहारों को सक्रिय रूप से मनाने का आह्वान किया। इस अवसर पर पारगना बाबा और माझी बाबा ने सेंदरा वीरों का स्वागत किया और उन्हें सकुशल घर लौटने की शुभकामनाएं दीं।
दलमा वन्यजीव अभयारण्य में सेंदरा पर्व के दौरान इस बार जंगली जानवरों का शिकार नहीं हुआ है। यह इस अभ्यारण्य के लिए सुखद संकेत है। हमें उम्मीद है कि भविष्य में भी इसी प्रकार सभी का सहयोग मिलता रहेगा, जिससे दलमा वन्यप्राणी आश्रयणी में वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।
-सबा आलम अंसारी, डीएफओ दलमा

